ग़ज़ल

हर इक मक़ाम से आगे गुज़र गया मह-ए-नौ

हर इक मक़ाम से आगे गुज़र गया मह-ए-नौ

यह ग़ज़ल बताती है कि चाँद (मह-ए-नौ) हर जगह से आगे निकल गया है, जिससे यह सवाल उठता है कि यह कमाल किसे हासिल हुआ है। शायर कहता है कि चाहे साँस की ताक़त से फूल (गूँचा) खिल जाए, लेकिन जिसे सूरज की रोशनी (आफ़ताब) का नसीब नहीं, उसे कभी पूर्णता नहीं मिलेगी। अंत में, वह कहता है कि अगर तेरी नज़र पाक है तो दिल भी पाक है, और दिल को हक़ ने नज़र का परदा दिया है।

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लिपि व अर्थ
1
हर इक मक़ाम से आगे गुज़र गया मह-ए-नौ कमाल किस को मयस्सर हुआ है बे-तग-ओ-दौ
हर जगह से नौ चंद्रमा गुजर गए; बिना किसी बंधन या प्रयास के कमाल किसे मिला है।
2
नफ़स के ज़ोर से वो ग़ुंचा वा हुआ भी तो क्या जिसे नसीब नहीं आफ़्ताब का परतव
साँस की ताकत से अगर वह कली खिल भी जाए, तो क्या लाभ, जिसे सूरज के भाग्य का आवरण नसीब नहीं है।
3
निगाह पाक है तेरी तो पाक है दिल भी कि दिल को हक़ ने किया है निगाह का पैरव
यदि आपकी निगाह पवित्र है, तो दिल भी पवित्र है। क्योंकि दिल को तक़दीर ने आपकी निगाह का क़ैदी बनाया है।
4
पनप सका न ख़याबाँ में लाला-ए-दिल-सोज़ कि साज़गार नहीं ये जहान-ए-गंदुम-ओ-जौ
ख़याबाँ में लाला-ए-दिल-सोज़ पनप सका न, कि साज़गार नहीं ये जहान-ए-गंदुम-ओ-जौ।
5
रहे न 'ऐबक' ओ 'ग़ौरी' के मारके बाक़ी हमेशा ताज़ा ओ शीरीं है नग़्मा-ए-'ख़ुसरौ'
ऐबक और गौरी के वार के बाद कुछ भी बाकी नहीं रहता, खूसरौ का नग़मा हमेशा ताज़ा और मीठा होता है।
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