ग़ज़ल

सुन तो सही जहान में है तेरा फ़साना क्या

سن تو سہی جہان مین ہے نیرا فسانہ کیا

Source: Kulliyat-e-Aatish (Matba Munshi Naval Kishore, Lucknow) · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सुन तो सही जहान में है तेरा फ़साना क्या कहती हो तुझको ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ग़ाइबाना क्या
ज़रा सुन तो सही, इस दुनिया में तेरी कहानी क्या है। ख़ुदा की मख़लूक़ तेरे बारे में तेरी ग़ैरमौजूदगी में क्या कहती है।
2
क्या क्या उलझता है तेरी ज़ुल्फ़ों के तार से बख़्ता तलब हो सीना-ए-सद-चाक शाना क्या
तेरी ज़ुल्फ़ों के धागों में न जाने क्या-क्या उलझ जाता है। सौ जगह से फटे सीने वाला कंघा भला किस खुशकिस्मती की चाह रखे?
3
ज़ेर-ए-ज़मीन से आता है जो गुल सो ज़र-ब-कफ़ क़ारून ने रास्ते में लुटाया ख़ज़ाना क्या
ज़मीन के नीचे से जो फूल निकलता है वह अपनी हथेली में सोना लिए आता है—तो क्या क़ारून ने अपना ख़ज़ाना रास्ते में लुटा दिया था?
4
उड़ता है शौक़-ए-राहत-ए-मंज़िल से बहब-ए-उम्र महमेज़ कहते हैं गे किसे ताज़ियाना क्या
जीवन का घोड़ा मंज़िल के आराम की चाह में तेज़ी से उड़ता-दौड़ता है; ऐसे दौड़ने वाले के लिए एड़ी (महमेज़) और चाबुक (ताज़ियाना) का क्या अर्थ है?
5
ज़ीना सबा का ढूँढती है अपनी मुश्त-ए-ख़ाक बाम-ए-बुलंद यार का है आस्ताना क्या
मेरी मुट्ठी भर ख़ाक सुबह की हवा की सीढ़ी ढूँढती है; क्या यार की ऊँची छत महज़ एक आस्ताना है?
6
चारों तरफ़ से सूरत-ए-जानाँ हो जल्वा-गर दिल साफ़ हो तेरा तो है आईना-ख़ाना क्या
चारों दिशाओं से माशूक़ का चेहरा जगमगाता हुआ प्रकट हो रहा है; यदि तेरा दिल साफ़ हो तो फिर यह आईनों का घर क्या है।
7
सय्याद असीर-ए-दाम-ए-रग-ए-गुल हो अंदलीब दिखला रहा है छुप के उसे दाम-ओ-दाना क्या
ऐ बुलबुल, शिकारी ख़ुद गुलाब की पंखुड़ियों की रगों के जाल में क़ैद हो जाए—क्योंकि वह छुप कर उसे जाल और दाना दिखा रहा है।
8
तब्ल-ओ-अलम न पास है अपने न मुल्क माल हमसे ख़िलाफ़ होके करेगा ज़माना क्या
हमारे पास न तो नौबत और झंडा (सत्ता के प्रतीक) हैं, न कोई राज्य और न धन-दौलत। फिर भला ज़माना हमारे विरुद्ध होकर हमारा क्या बिगाड़ लेगा?
9
आती हो किस तरह से मेरी क़ब्ज़-ए-रूह को देखूँ तो मौत ढूँढ रही हो बहाना क्या
ऐ मौत, तू मेरी रूह को क़ब्ज़ करने किस तरह से आती है, ज़रा देखूँ तो सही कि तू क्या बहाना ढूँढ रही है।
10
होता है ज़र्द सुन के जो नामर्द मुद्दई रुस्तम की दास्तान है हमारा फ़साना क्या
जिसे सुनकर कायर दुश्मन का रंग उड़ जाता है, हमारी कहानी तो रुस्तम की दास्तान जैसी है, फिर यह महज़ एक किस्सा कैसे हुआ।
11
बे-यार साज़-दार न होएगा गोश को मुतरिब हमें सुनाता है अपना तराना क्या
बिना यार के कोई भी साज़ कान के लिए सुरीला नहीं होगा; फिर मुतरिब हमें अपना गीत सुनाकर क्या लाभ देगा।
12
सय्याद गुलज़ार दिखाता है सैर-ए-बाग़ बुलबुल क़फ़स में याद करे आशियाना क्या
शिकारी बाग़ की सैर और उसकी रौनक़ दिखाता है, मगर पिंजरे में क़ैद बुलबुल अपने घोंसले को भला क्यों याद करे?
13
तिरछी निगह से ताइर-ए-दिल हो चुका शिकार जब तीर कज पड़ेगा उठेगा निशाना क्या
एक तिरछी नज़र से ही दिल का परिंदा शिकार हो गया; जब तीर टेढ़ा ही पड़ेगा तो फिर निशाना क्या उठेगा।
14
बेताब है कमाल हमारा दिल-ए-हज़ीं मेहमान सरा-ए-जिस्म का होगा रवाना क्या
हमारा दुखी दिल हद से ज़्यादा बेचैन है; यह शरीर रूपी सराय का मेहमान न जाने कब कूच कर जाएगा।
15
यूँ मुद्दई हसद से न दे दाद तो न दे आतिश ग़ज़ल ये तू ने कही आशिक़ाना क्या
अगर प्रतिद्वंद्वी ईर्ष्या के कारण दाद न दे, तो न दे; ऐ आतिश, तूने यह कैसी आशिक़ाना ग़ज़ल कही है!
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