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ग़ज़ल

ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना

ذکر اس پری وش کا اور پھر بیاں اپنا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: अपना

यह ग़ज़ल एक प्रेमी के गहन कष्ट और इम्तिहान को मार्मिक ढंग से बयान करती है, जहाँ उसका विश्वसनीय राज़दार भी महबूब के लिए रक़ीब बन जाता है। शायर महबूब की बेरुखी और तिरस्कार को धैर्यपूर्वक सहता है, यहाँ तक कि एक साझे परिचित में कुछ अजीब सुकून भी पाता है। इसमें दुनियावी सीमाओं से परे, एक परम, स्वर्गीय मिलन की लालसा भी व्यक्त की गई है।

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1
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना बन गया रक़ीब आख़िर था जो राज़-दाँ अपना
उस परी जैसी ख़ूबसूरत महबूबा का ज़िक्र और फिर मेरे अपने बयान, आख़िरकार उसने मेरे राज़दार को ही प्रतिद्वंद्वी बना दिया।
2
मय वो क्यूँ बहुत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहाँ अपना
हे भगवान, वे प्रतिद्वंद्वी की महफ़िल में इतनी शराब क्यों पी रहे थे? आज ही तो उन्होंने मेरी परीक्षा को मंज़ूर किया है।
3
मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते अर्श से उधर होता काश के मकाँ अपना
हम एक और ऊँचाई पर एक और नज़ारा बना सकते थे, काश हमारा ठिकाना अर्श से भी परे होता।
4
दे वो जिस क़दर ज़िल्लत हम हँसी में टालेंगे बारे आश्ना निकला उन का पासबाँ अपना
वे जितनी चाहें उतनी बेइज़्ज़ती दें, हम उसे हँसी में टाल देंगे। आख़िरकार, उनका रखवाला हमारा परिचित निकला।
5
दर्द-ए-दिल लिखूँ कब तक जाऊँ उन को दिखला दूँ उँगलियाँ फ़िगार अपनी ख़ामा ख़ूँ-चकाँ अपना
मैं अपने दिल का दर्द कब तक लिखूँ? क्या मुझे उनके पास जाकर उन्हें यह सब दिखा देना चाहिए, क्योंकि मेरी उँगलियाँ ज़ख़्मी हो गई हैं और मेरा कलम खून टपका रहा है।
6
घिसते घिसते मिट जाता आप ने अबस बदला नंग-ए-सज्दा से मेरे संग-ए-आस्ताँ अपना
आपके चौखट का पत्थर मेरे निरंतर सजदों से घिसते-घिसते मिट जाता। आपने उसे मेरे सजदों की शर्मिंदगी से बचने के लिए व्यर्थ ही बदल दिया।
7
ता करे न ग़म्माज़ी कर लिया है दुश्मन को दोस्त की शिकायत में हम ने हम-ज़बाँ अपना
ताकि वह बदनामी न करे, हमने अपने दुश्मन को दोस्त की शिकायत करते हुए अपना हमज़बान बना लिया है।
8
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे बे-सबब हुआ 'ग़ालिब' दुश्मन आसमाँ अपना
हम न तो ज़्यादा समझदार थे और न ही किसी कला में अद्वितीय थे। फिर भी, ग़ालिब, बिना किसी कारण के, आसमान (भाग्य) हमारा दुश्मन बन गया।
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