ग़ज़ल

वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा

وہ مری چین جبیں سے غم پنہاں سمجھا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: समझा

मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल अनकहे दर्द, गहन अंतर्दृष्टि और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। इसमें शायर ने दर्शाया है कि किस तरह माथे की शिकन से दिल का छिपा हुआ ग़म और बिखरे हुए अल्फ़ाज़ से पत्र का राज़ समझा जा सकता है। यह ग़ज़ल आत्म-जागरूकता और इश्क़ में उपजे विरह व बेचैनी की गहरी दास्तान है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा राज़-ए-मक्तूब ब-बे-रब्ती-ए-उनवाँ समझा
उसने मेरे माथे की सिलवटों को देखकर मेरा छुपा हुआ दुख समझ लिया, ठीक उसी तरह जैसे किसी पत्र के बेतरतीब शीर्षक से उसके भीतर का गुप्त भेद समझ लिया जाता है।
2
यक अलिफ़ बेश नहीं सैक़ल-ए-आईना हनूज़ चाक करता हूँ मैं जब से कि गरेबाँ समझा
आईने की चमक की लकीर अब भी महज़ एक 'अलिफ़' से अधिक नहीं है, हालाँकि जब से मुझे गिरेबान की समझ हुई है, तब से मैं उसे लगातार चाक करता (फाड़ता) रहा हूँ।
3
शरह-ए-असबाब-ए-गिरफ़्तारी-ए-ख़ातिर मत पूछ इस क़दर तंग हुआ दिल कि मैं ज़िंदाँ समझा
मेरे दिल के क़ैद होने के कारणों का ब्योरा मत पूछो; दिल इस क़दर तंग और घुट गया कि मैंने उसे ही क़ैदख़ाना समझ लिया।
4
बद-गुमानी ने न चाहा उसे सरगर्म-ए-ख़िराम रुख़ पे हर क़तरा अरक़ दीदा-ए-हैराँ समझा
बदगुमानी ने महबूब को आज़ादी या नाज़ से चलने न दिया, क्योंकि उसने चेहरे पर पसीने की हर बूँद को ताकती हुई हैरान आँख समझ लिया।
5
इज्ज़ से अपने ये जाना कि वो बद-ख़ू होगा नब्ज़-ए-ख़स से तपिश-ए-शोला-ए-सोज़ाँ समझा
अपनी बेबसी और लाचारी से मैंने यह समझ लिया कि वह बदमिज़ाज होगा, ठीक वैसे ही जैसे सूखे तिनके की नब्ज़ से भड़कती आग की तपिश का अंदाज़ा लगाया जाता है।
6
सफ़र-ए-इश्क़ में की ज़ोफ़ ने राहत-तलबी हर क़दम साए को मैं अपने शबिस्ताँ समझा
इश्क़ के सफ़र में कमज़ोरी ने आराम की ऐसी चाह पैदा कर दी कि मैं हर क़दम पर अपने ही साए को सोने का कमरा समझ बैठा।
7
था गुरेज़ाँ मिज़ा-ए-यार से दिल ता दम-ए-मर्ग दफ़-ए-पैकान-ए-क़ज़ा इस क़दर आसाँ समझा
दिल मरते दम तक महबूब की पलकों के तीरों से भागता रहा, उसने मौत और तक़दीर के तीर को टालना इतना आसान समझ लिया था।
8
दिल दिया जान के क्यूँ उस को वफ़ादार 'असद' ग़लती की कि जो काफ़िर को मुसलमाँ समझा
ऐ असद, तुमने उसे वफ़ादार समझकर अपना दिल क्यों दिया? तुमने एक काफ़िर को मुसलमान समझकर बहुत बड़ी ग़लती की।
9
हम ने वहशत-कदा-ए-बज़्म-ए-जहाँ में जूँ शम्अ' शो'ला-ए-इश्क़ को अपना सर-ओ-सामाँ समझा
दुनिया की इस वीरान और बेगाना महफ़िल में, एक मोमबत्ती की तरह, मैंने इश्क़ की आग को ही अपनी पूरी दौलत और सब कुछ समझा।
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