यक अलिफ़ बेश नहीं सैक़ल-ए-आईना हनूज़ — मिर्ज़ा ग़ालिब
“The mirror's polish is still no more than a single alif / Ever since I learned what a collar was, I have torn it apart.”
अर्थ
आईने की चमक की लकीर अब भी महज़ एक 'अलिफ़' से अधिक नहीं है, हालाँकि जब से मुझे गिरेबान की समझ हुई है, तब से मैं उसे लगातार चाक करता (फाड़ता) रहा हूँ।
विस्तार
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ अपने जुनून और दर्द की इंतहा को बड़ी नफ़ासत से बयां करते हैं। इश्क़ की दीवानगी में जब गरेबान फाड़ा जाता है, तो वह सीधा चीरा उर्दू के पहले हर्फ़ 'अलिफ़' की तरह दिखता है—ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने आईने को साफ़ करने के लिए उस पर पहली लकीर खींची जाती है। शायर मुस्कुराते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने होश संभालते ही उम्र भर अपने कपड़े तार-तार किए, मगर इस रूहानी सफ़र में दिल का आईना अभी सिर्फ़ पहले हर्फ़ जितना ही साफ़ हो पाया है, यानी इश्क़ की मंज़िल अभी बहुत दूर है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
