वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा — मिर्ज़ा ग़ालिब

वो मिरी चीन-ए-जबीं से ग़म-ए-पिन्हाँ समझा राज़-ए-मक्तूब ब-बे-रब्ती-ए-उनवाँ समझा

“From the furrow on my brow, my hidden grief was understood; as the secret of a letter is read in the disorder of its title.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

उसने मेरे माथे की सिलवटों को देखकर मेरा छुपा हुआ दुख समझ लिया, ठीक उसी तरह जैसे किसी पत्र के बेतरतीब शीर्षक से उसके भीतर का गुप्त भेद समझ लिया जाता है।

विस्तार

इस शेर में ग़ालिब उस गहरी समझ की बात करते हैं जो बिना कहे दिल का सारा हाल भाँप लेती है। जैसे किसी ख़त का बिखरा और बेतरतीब शीर्षक देखकर ही कोई अंदाज़ा लगा ले कि अंदर कितना दर्द भरा पैगाम छिपा है, ठीक वैसे ही महबूब ने माथे की हल्की सी शिकन देखकर दिल का सारा छुपा हुआ ग़म पहचान लिया। यह एहसास की उस नज़ाकत को दिखाता है जहाँ चेहरे की एक लकीर ही भीतर मचे तूफ़ान का पता दे देती है।

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