ग़ज़ल

सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर

سیاہی جیسے گر جائے دم تحریر کاغذ پر
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 16 shers· radif: की

यह ग़ज़ल हिज्र के असहनीय दर्द और बदक़िस्मती के अंधकार को बयां करती है, जहाँ जुदाई की रातों की तुलना काग़ज़ पर अचानक गिरी स्याही के अमिट दाग़ से की गई है। इसमें विरह की तड़प, दिल के सोज़ और इश्क़ की गहरी उदासी का मार्मिक चित्रण मिलता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर मिरी क़िस्मत में यूँ तस्वीर है शब-हा-ए-हिज्राँ की
जैसे लिखते समय काग़ज़ पर स्याही फैल जाती है, ठीक उसी तरह मेरी क़िस्मत में जुदाई की रातों की तस्वीर खिंची हुई है।
2
कहूँ क्या गर्म-जोशी मय-कशी में शोला-रूयाँ की कि शम-ए-ख़ाना-ए-दिल आतिश-ए-मय से फ़रोज़ाँ की
शराब पीने में शोला जैसे दमकते चेहरों वाले महबूबों के जोश का मैं क्या बयान करूँ, जिन्होंने दिल के घर की शमा को शराब की आग से रोशन कर दिया।
3
हमेशा मुझ को तिफ़्ली में भी मश्क़-ए-तीरह-रोज़ी थी सियाही है मिरे अय्याम में लौह-ए-दबिस्ताँ की
मुझे बचपन में भी हमेशा दुर्भाग्य का ही अभ्यास रहता था; मेरे जीवन के दिनों की यह काली रात दरअसल स्कूल की तख़्ती की वही पुरानी स्याही है।
4
दरेग़ आह-ए-सहर-गह कार-ए-बाद-ए-सुब्ह करती है कि होती है ज़ियादा सर्द-मेहरी शम्अ-रूयाँ की
अफ़सोस कि मेरी सुबह की आह भोर की हवा का काम करती है, क्योंकि इससे शमा जैसे चेहरे वाले महबूबों की बेरुख़ी और बढ़ जाती है।
5
मुझे अपने जुनूँ की बे-तकल्लुफ़ पर्दा-दारी थी व-लेकिन क्या करूँ आवे जो रुस्वाई गरेबाँ की
मैं बेझिझक अपने दीवानेपन को छिपाने की कोशिश कर रहा था, मगर क्या करूँ जब मेरे फटे हुए गिरेबाँ ने ही मेरी रुसवाई ज़ाहिर कर दी।
6
हुनर पैदा किया है मैं ने हैरत-आज़माई में कि जौहर आइने का हर पलक है चश्म-ए-हैराँ की
मैंने हैरानी का अनुभव करने में ऐसा हुनर हासिल कर लिया है कि मेरी हैरान आँख की हर पलक आईने के जौहर (नक़्श) की तरह बन गई है।
7
ख़ुदाया किस क़दर अहल-ए-नज़र ने ख़ाक छानी है कि हैं सद-रख़्ना जूँ ग़िर्बाल दीवारें गुलिस्ताँ की
हे ईश्वर, पारखी लोगों ने किस हद तक ख़ाक छानी (तलाश की) है कि बाग़ की दीवारें सैकड़ों सूराख़ों के कारण छलनी जैसी हो गई हैं।
8
हुआ शर्म-ए-तही-दस्ती से से वो भी सर-निगूँ आख़िर बस ऐ ज़ख़्म-ए-जिगर अब देख ले शोरिश नमक-दाँ की
आख़िरकार अपने ख़ाली हाथ होने की शर्म से नमकदान भी सिर झुका बैठा (उलट गया); ऐ दिल के ज़ख़्म, बस अब तू इस नमकदान की मचाई हुई हलचल देख।
9
बयाद-ए-गर्मी-ए-सोहबत ब-रंग-ए-शोला दहके है छुपाऊँ क्यूँकि 'ग़ालिब' सोज़िशें दाग़-ए-नुमायाँ की
महबूब के साथ की गर्मजोशी की याद में दिल शोले की तरह दहक रहा है। ऐ ग़ालिब, इतने साफ़ दिखने वाले ज़ख़्म की जलन को मैं भला कैसे छुपाऊँ?
10
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की नमक-पाश-ए-ख़राश-ए-दिल है लज़्ज़त ज़िंदगानी की
अगर दीवानगी पर खुशी से सुकून पाने का इल्ज़ाम न लगे, तो ज़िंदगी का मज़ा दिल के ज़ख़्म पर नमक छिड़कने के सिवा कुछ नहीं है।
11
कशाकश-हा-ए-हस्ती से करे क्या सई-ए-आज़ादी हुइ ज़ंजीर-ए-मौज-ए-आब को फ़ुर्सत रवानी की
इंसान ज़िंदगी की उलझनों और संघर्षों से छुटकारा पाने की कोशिश क्यों करे? क्या पानी की लहरों की ज़ंजीर को कभी बहने से फ़ुर्सत मिली है?
12
न खींच ऐ सई-ए-दस्त-ए-ना-रसा ज़ुल्फ़-ए-तमन्ना को परेशाँ-तर है मू-ए-ख़ामा से तदबीर मानी की
ऐ नाकाम हाथ की कोशिश, तू तमन्ना की ज़ुल्फ़ों को मत खींच; क्योंकि मानी (चित्रकार) की तदबीर क़लम के बाल से भी ज़्यादा उलझी हुई है।
13
कहाँ हम भी रग-ओ-पै रखते हैं इंसाफ़ बहत्तर है न खींचे ताक़त-ए-ख़म्याज़ा तोहमत ना-तवानी की
हमारे अंदर नसें और माँसपेशियाँ कहाँ बची हैं, इंसाफ़ तो यही होगा कि अंगड़ाई लेने के ज़ोर पर हमारी कमज़ोरी का इल्ज़ाम न लगाया जाए।
14
तकल्लुफ़-बरतरफ़ फ़रहाद और इतनी सुबु-दस्ती ख़याल आसाँ था लेकिन ख़्वाब-ए-ख़ुसरव ने गिरानी की
तकल्लुफ़ को एक तरफ़ रखें तो क्या फ़रहाद में सचमुच इतनी फुर्ती और महारत थी? यह सोचना तो आसान था, लेकिन ख़ुसरव के ख़्वाब ने इस काम को बेहद भारी और कठिन बना दिया।
15
पस-अज़-मुर्दन भी दीवाना ज़ियारत-गाह-ए-तिफ़्लाँ है शरार-ए-संग ने तुर्बत पे मेरी गुल-फ़िशानी की
मरने के बाद भी यह दीवाना बच्चों के मिलने का स्थान बना हुआ है, और उनके फेंके पत्थरों से निकली चिंगारियों ने मेरी कब्र पर फूल बरसा दिए हैं।
16
'असद' को बोरिए में धर के फूँका मौज-ए-हस्ती ने फ़क़ीरी में भी बाक़ी है शरारत नौजवानी की
जिंदगी की मौज ने असद को बोरिए में लपेटकर जला दिया, फिर भी इस फकीरी के दौर में उसकी जवानी की शरारत अब भी बाकी है।
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