तकल्लुफ़-बरतरफ़ फ़रहाद और इतनी सुबु-दस्ती — मिर्ज़ा ग़ालिब
“Pretenses set aside, could Farhad truly command such swift and nimble hands? The fancy seemed easy, yet the dream of Khusrau weighed heavy on the task.”
अर्थ
तकल्लुफ़ को एक तरफ़ रखें तो क्या फ़रहाद में सचमुच इतनी फुर्ती और महारत थी? यह सोचना तो आसान था, लेकिन ख़ुसरव के ख़्वाब ने इस काम को बेहद भारी और कठिन बना दिया।
विस्तार
शायर यहाँ फ़रहाद की मशहूर दास्तान पर खुलकर बात करते हुए पूछते हैं कि क्या चट्टानें काटना सचमुच इतना आसान था? ख़याल की दुनिया में तो इश्क़ का रास्ता बहुत सीधा और हल्का महसूस होता है, लेकिन जब ख़ुसरव जैसी शाही ताक़त और कड़वी हक़ीक़त सामने आती है, तो उसका बोझ दिल को दबा देता है। यह शेर इस बात का अहसास कराता है कि प्रेम की राह में पहाड़ काटना उतना मुश्किल नहीं होता, जितना ज़माने और रक़ीब के रुतबे का वज़न सहना होता है।
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