हमेशा मुझ को तिफ़्ली में भी मश्क़-ए-तीरह-रोज़ी थी — मिर्ज़ा ग़ालिब

हमेशा मुझ को तिफ़्ली में भी मश्क़-ए-तीरह-रोज़ी थी सियाही है मिरे अय्याम में लौह-ए-दबिस्ताँ की

“Even in childhood I was practiced in dark misfortune; the blackness of my days is merely the ink from my school slate.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

मुझे बचपन में भी हमेशा दुर्भाग्य का ही अभ्यास रहता था; मेरे जीवन के दिनों की यह काली रात दरअसल स्कूल की तख़्ती की वही पुरानी स्याही है।

विस्तार

शायर अपनी तकलीफ़ और उदासी की जड़ें बचपन से जोड़ते हुए एक बड़ी ख़ूबसूरत और दर्द भरी बात कहता है। वह कहता है कि बचपन में स्कूल की तख़्ती पर काली स्याही से लिखना महज़ पढ़ाई नहीं, बल्कि उस बदकिस्मती और ग़म का रियाज़ था जो आगे चलकर मेरी क़िस्मत बननी थी। आज जो मेरी ज़िंदगी के दिनों में अंधेरा और मायूसी पसरी है, वह दरअस्ल उसी बचपन की तख़्ती की स्याही का असर है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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