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ग़ज़ल

शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है

شبنم ب گلِ لالہ نہ خالی ز ادا ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: है

यह ग़ज़ल एक प्रेमी के गहरे दुख और अतृप्त लालसा को दर्शाती है। यह गुल-ए-लाला पर शबनम की उपमा से प्रेमी के हृदय के रक्तस्राव और प्रिय की मोहक सुंदरता का चित्रण करती है, जो अतृप्त इच्छा के तीव्र दर्द को उजागर करता है। शेर प्रिय के मनमोहक आकर्षण और उसकी एक झलक पाने की प्रेमी की तीव्र तड़प को खूबसूरती से व्यक्त करते हैं।

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1
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है दाग़-ए-दिल-ए-बेदर्द नज़र-गाह-ए-हया है
ट्यूलिप के फूल पर ओस की बूँद अपनी अदा (शोभा) से खाली नहीं है। एक बेदर्द दिल पर लगा दाग़ शर्म का विषय होता है।
2
दिल ख़ूँ-शुदा-ए-कशमकश-ए-हसरत-ए-दीदार आईना ब-दस्त-ए-बुत-ए-बद-मस्त हिना है
मेरा दिल महबूब के दीदार की हसरत की कशमकश में लहूलुहान है। मदहोश महबूब के हाथ में रखा आईना खुद हिना (मेहंदी) है।
3
शोले से न होती हवस-ए-शोला ने जो की जी किस क़दर अफ़्सुर्दगी-ए-दिल पे जला है
शोले की चाहत ने वह कर दिखाया जो स्वयं शोला न कर सका। दिल की इस उदासी पर मेरा जी कितना जल गया है।
4
तिमसाल में तेरी है वो शोख़ी कि ब-सद-ज़ौक़ आईना ब-अंदाज़-ए-गुल आग़ोश-कुशा है
तुम्हारी छवि में ऐसी शोख़ी है कि दर्पण सौ इच्छाओं के साथ, एक फूल की तरह अपना आगोश खोल रहा है।
5
क़ुमरी कफ़-ए-ख़ाकीस्तर ओ बुलबुल क़फ़स-ए-रंग ऐ नाला निशान-ए-जिगर-ए-सोख़्ता क्या है
कबूतर राख की एक मुट्ठी है और बुलबुल रंगों का एक पिंजरा है। ऐ आह, जले हुए जिगर का क्या निशान है?
6
ख़ू ने तिरी अफ़्सुर्दा किया वहशत-ए-दिल को माशूक़ी ओ बे-हौसलगी तरफ़ा बला है
तुम्हारी आदत ने दिल की बेचैनी को शांत कर दिया है। महबूब होना और साथ ही हिम्मत न होना एक अजीब मुसीबत है।
7
मजबूरी ओ दावा-ए-गिरफ़्तारी-ए-उल्फ़त दस्त-ए-तह-ए-संग-आमदा पैमान-ए-वफ़ा है
मजबूरी और प्रेम में गिरफ्तार होने का दावा ऐसा है जैसे वफ़ा का वादा पत्थर के नीचे दबा हाथ हो। यह दर्शाता है कि मजबूरी में वफ़ा का वादा निभाना अत्यंत कठिन है।
8
मालूम हुआ हाल-ए-शहीदान-ए-गुज़श्ता तेग़-ए-सितम आईना-ए-तस्वीर-नुमा है
बीते हुए शहीदों का हाल मालूम हुआ। अत्याचार की तलवार एक ऐसा आइना है जो उनकी तस्वीर दिखाता है।
9
ऐ परतव-ए-ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब इधर भी साए की तरह हम पे अजब वक़्त पड़ा है
ऐ दुनिया को रौशन करने वाले सूरज की किरण, ज़रा हमारी तरफ़ भी देखो। हम पर एक अजीब वक़्त आ पड़ा है, जैसे कोई साया।
10
ना-कर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद या रब अगर इन कर्दा गुनाहों की सज़ा है
हे प्रभु, यदि मेरे किए हुए गुनाहों के लिए सज़ा है, तो मेरी यह इच्छा है कि जो गुनाह मैंने नहीं किए, उनकी हसरत को भी दाद मिले।
11
बेगानगी-ए-ख़ल्क़ से बे-दिल न हो 'ग़ालिब' कोई नहीं तेरा तो मिरी जान ख़ुदा है
गालिब, दुनिया की बेरुखी से निराश मत हो। यदि कोई तुम्हारा नहीं है तो मेरी जान, खुदा है।
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