ग़ज़ल
जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
جنوں کی دست گیری کس سے ہو گر ہو نہ عریانی
यह ग़ज़ल जुनून और ग़म की ज़बरदस्त शिद्दत को बयान करती है, जहाँ दीवानगी अपनी असली अभिव्यक्ति पूर्ण नग्नता में पाती है। इसमें दिल की अटूट बेचैनी और खोई हुई खुशियों की गहरी आरज़ू का चित्रण है, जहाँ किस्मत को पिछले ज़ख़्मों के लिए जवाबदेह ठहराया जाता है, मानो लूटी हुई चीज़ें रहज़न पर कर्ज़ हों।
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1
जुनूँ की दस्त-गीरी किस से हो गर हो न उर्यानी
गरेबाँ-चाक का हक़ हो गया है मेरी गर्दन पर
दीवानगी को अपनी नग्नता के सिवा और कौन सहारा देगा? अब मेरी गर्दन पर गिरेबाँ (कॉलर) फाड़ने का हक़ आ गया है।
2
बा-रंग-ए-कागज़-ए-आतिश-ज़दा नैरंग-ए-बेताबी
हज़ार आईना दिल बाँधे है बाल-ए-यक-तपीदन पर
बेताबी का जादू जलते हुए कागज़ जैसा है, जिसके एक ही कंपन के पंख से हज़ारों दर्पण-रूपी दिल बंधे हुए हैं।
3
फ़लक से हम को ऐश-ए-रफ़्ता का क्या क्या तक़ाज़ा है
मता-ए-बुर्दा को समझे हुए हैं क़र्ज़ रहज़न पर
हम भाग्य से अपने बीते हुए सुखों की कितनी ज़िद करते हैं! ऐसा लगता है जैसे हम चोरी हुए सामान को लुटेरे पर उधार समझ रहे हों।
4
हम और वो बे-सबब रंज-आशना दुश्मन कि रखता है
शुआ-ए-मेहर से तोहमत निगह की चश्म-ए-रौज़न पर
हम और वह दुश्मन, जो अकारण दुख से परिचित है, सूर्य की किरण के माध्यम से खिड़की की आँख पर एक नज़र का दोष लगाता है।
5
फ़ना को सौंप गर मुश्ताक़ है अपनी हक़ीक़त का
फ़रोग़-ए-ताला-ए-ख़ाशाक है मौक़ूफ़ गुलख़न पर
यदि आप अपनी सच्ची वास्तविकता को जानना चाहते हैं, तो स्वयं को फ़ना के सुपुर्द कर दें। क्योंकि धूल की चमक और भाग्य भी भट्ठी पर निर्भर करता है।
6
'असद' बिस्मिल है किस अंदाज़ का क़ातिल से कहता है
कि मश्क़-ए-नाज़ कर ख़ून-ए-दो-आलम मेरी गर्दन पर
असद, यह किस अद्भुत अंदाज़ का बिस्मिल है जो क़ातिल से कहता है कि तुम अपनी नाज़ुक अदाओं का अभ्यास करो, सारे संसार का रक्त मेरी गर्दन पर सही।
7
फ़ुसून-ए-यक-दिली है लज़्ज़त-ए-बेदाद दुश्मन पर
कि वज्द-ए-बर्क़ जूँ परवाना बाल-अफ़्शाँ है ख़िर्मन पर
एकजुटता का जादू दुश्मन के लिए अत्याचार का आनंद है, क्योंकि बिजली का उन्माद, पतंगे की तरह, फसल पर अपने पंख बिखेर रहा है।
8
तकल्लुफ़ ख़ार-ख़ार-ए-इल्तिमास-ए-बे-क़ारारी है
कि रिश्ता बाँधता है पैरहन अंगुश्त-ए-सोज़न पर
तकल्लुफ़ बेचैनी भरी इल्तिजा का एक चुभता हुआ काँटा है। यह ठीक वैसे ही है जैसे एक कपड़ा धागे को सुई के छेद से बांधकर उसकी चाल को नियंत्रित करता है।
9
ये क्या वहशत है ऐ दीवाने पेश-अज़-मर्ग वावैला
रक्खी बे-जा बिना-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर-ए-शेवन पर
ये क्या पागलपन है, ऐ दीवाने, मौत से पहले ही यह विलाप? तुमने दुख की ज़ंजीरों के घर की नींव ग़लत जगह रखी है।
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