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ग़ज़ल

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और

ہے بس-کہ ہر اک اُن کے اشارے میں نشاں اور
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: और

यह ग़ज़ल महबूब की नासमझी और बेरुख़ी पर आशिक़ के दर्द को बयान करती है, जहाँ हर इशारा एक नया और अक्सर भ्रामक अर्थ रखता है। शायर खुदा से इल्तिजा करता है कि महबूब को समझने वाला दिल बख्शे, क्योंकि उसके अपने लफ़्ज़ प्यार की गहराई समझाने में नाकाम रहे हैं। महबूब की बेपरवाह या तीखी नज़र के बावजूद, आशिक़ अपनी अदम्य मोहब्बत का इज़हार करता है, बाज़ार से बेशुमार दिल और जान लाने को तैयार है, जो उसके अनंत बलिदान और प्यार की क्षमता को दर्शाता है।

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1
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और करते हैं मोहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और
उनके हर इशारे में एक अलग संकेत होता है। जब वे प्यार करते हैं, तो एक नया संदेह मन में आता है।
2
या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
हे ईश्वर, वे मेरी बात न तो समझे हैं और न ही कभी समझेंगे। उन्हें कोई और दिल दे दे, अगर तू मुझे कोई और जुबान नहीं देता।
3
अबरू से है क्या उस निगह-ए-नाज़ को पैवंद है तीर मुक़र्रर मगर इस की है कमाँ और
उस नाज़ुक निगाह का भौंह से क्या संबंध है? यह निश्चित रूप से एक तीर है, लेकिन इसका धनुष कुछ और ही है।
4
तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे ले आएँगे बाज़ार से जा कर दिल ओ जाँ और
जब तुम शहर में हो तो हमें कोई दुख नहीं हो सकता। जब हम उठेंगे, तो बाज़ार से जाकर और दिल और जान ले आएँगे।
5
हर चंद सुबुक-दस्त हुए बुत-शिकनी में हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ और
हम मूर्ति तोड़ने में भले ही निपुण हो गए हों, पर जब तक हम मौजूद हैं, रास्ते में अभी एक और भारी पत्थर पड़ा है।
6
है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता होते जो कई दीदा-ए-ख़ूँनाबा-फ़िशाँ और
अगर खून के आँसू बहाने वाली और भी आँखें होतीं, तो मेरा दिल जिगर के खून के साथ खुलकर रोता।
7
मरता हूँ इस आवाज़ पे हर चंद सर उड़ जाए जल्लाद को लेकिन वो कहे जाएँ कि हाँ और
मैं उस आवाज़ पर मर मिटूँगा, भले ही मेरा सर कट जाए। लेकिन वे जल्लाद से कहते रहें कि 'हाँ, और (प्रहार करो)।'
8
लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का धोका हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और
लोगों को दुनिया को रोशन करने वाले सूरज का धोखा है। मैं तो हर रोज़ एक और छिपा हुआ घाव दिखाता हूँ।
9
लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और
अगर मेरे दिल ने तुम्हें अपना न बनाया होता, तो उसे एक पल भी चैन न मिलता। और यदि वह मरा न होता, तो वह और कई दिन आहें भरता और विलाप करता।
10
पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले रुकती है मिरी तब्अ' तो होती है रवाँ और
जब नदियाँ अपना रास्ता नहीं पातीं, तो वे उमड़ पड़ती हैं और भर जाती हैं। इसी तरह, जब मेरी प्रकृति या रचनात्मकता बाधित होती है, तो वह और भी अधिक वेग से प्रवाहित होती है।
11
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
दुनिया में और भी बहुत अच्छे कवि हैं, लोग कहते हैं कि ग़ालिब की अभिव्यक्ति का अंदाज़ अलग ही है।
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