ग़ज़ल
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
گئی وہ بات کہ ہو گفتگو تو کیونکر ہو
यह ग़ज़ल सार्थक संवाद के खोए हुए अवसर का दुख व्यक्त करती है, यह दर्शाते हुए कि सही समय बीत जाने के कारण बातचीत व्यर्थ हो गई है। यह वक्ता के आंतरिक संघर्ष और उन बाधाओं को उजागर करती है, जो शायद प्रियतम के स्वभाव या परिस्थितियों के कारण, किसी भी वास्तविक संवाद को रोकती हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो
कहे से कुछ न हुआ फिर कहो तो क्यूँकर हो
वह बात अब नहीं रही कि बातचीत हो सके, तो वह कैसे हो? कहने से जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो फिर से कैसे कहा जाए?
2
हमारे ज़ेहन में उस फ़िक्र का है नाम विसाल
कि गर न हो तो कहाँ जाएँ हो तो क्यूँकर हो
हमारे ज़ेहन में उस विचार का नाम 'विसाल' है। यदि वह न हो तो हम कहाँ जाएँ, और यदि वह हो तो कैसे संभव हो?
3
अदब है और यही कश्मकश तो क्या कीजे
हया है और यही गू-मगू तो क्यूँकर हो
यदि अदब (शिष्टाचार) है और यही कश्मकश (दुविधा) है, तो क्या किया जाए? यदि हया (लज्जा) है और यही गू-मगू (असमंजस) है, तो यह कैसे संभव हो सकता है?
4
तुम्हीं कहो कि गुज़ारा सनम-परस्तों का
बुतों की हो अगर ऐसी ही ख़ू तो क्यूँकर हो
आप ही बताइए कि मूर्ति पूजकों का गुज़ारा कैसे होगा, अगर मूर्तियों का स्वभाव ऐसा ही हो।
5
उलझते हो तुम अगर देखते हो आईना
जो तुम से शहर में हों एक दो तो क्यूँकर हो
जब तुम आईना देखते हो तो उलझ जाते हो। अगर शहर में तुम जैसे एक-दो और होते तो फिर कैसे होता?
6
जिसे नसीब हो रोज़-ए-सियाह मेरा सा
वो शख़्स दिन न कहे रात को तो क्यूँकर हो
जिस व्यक्ति को मेरे जैसा काला दिन नसीब हो, वह भला रात को दिन क्यों न कहेगा?
7
हमें फिर उन से उमीद और उन्हें हमारी क़द्र
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्यूँकर हो
हमें अब भी उनसे उम्मीद है और यह भी कि वे हमारी क़द्र करें। पर अगर वे हमसे बात भी न पूछें तो यह सब कैसे संभव होगा?
8
ग़लत न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का
न माने दीदा-ए-दीदार जो तो क्यूँकर हो
हमें उस ख़त से तसल्ली मिलने का विश्वास ग़लत नहीं था। लेकिन अगर देखने वाली आँख ही भरोसा न करे, तो भला यह कैसे संभव हो सकता है?
9
बताओ उस मिज़ा को देख कर कि मुझ को क़रार
वो नीश हो रग-ए-जाँ में फ़रो तो क्यूँकर हो
बताओ उस निगाह को देखकर मुझे कैसे चैन आ सकता है? जब वो चुभन मेरी जान की रगों में उतर चुकी हो, तो ऐसा कैसे हो सकता है?
10
मुझे जुनूँ नहीं 'ग़ालिब' वले ब-क़ौल-ए-हुज़ूर
फ़िराक़-ए-यार में तस्कीन हो तो क्यूँकर हो
ग़ालिब, मुझे पागलपन नहीं है, लेकिन पूज्यनीय वचन के अनुसार, यदि प्रियतम के वियोग में शांति मिल सकती है, तो वह कैसे संभव है?
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