ग़लत न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का
न माने दीदा-ए-दीदार जो तो क्यूँकर हो
“My faith in that letter to bring solace was not vain;But if the eye, so keen to see, itself disbelieves, how can it attain?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
हमें उस ख़त से तसल्ली मिलने का विश्वास ग़लत नहीं था। लेकिन अगर देखने वाली आँख ही भरोसा न करे, तो भला यह कैसे संभव हो सकता है?
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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