ग़ज़ल

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे

دیکھ کر در پردہ گرمِ دامَن افشانی مجھے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: मुझे

यह ग़ज़ल शायर की गहरी भावनात्मक अवस्था और एकतरफ़ा इश्क़ को दर्शाती है। महबूब की परदे के पीछे से देखी गई बेरुखी और बेपरवाही शायर की संवेदनशीलता, गहरे ग़म और निरंतर आंतरिक खोज के साथ प्रस्तुत की गई है। अंततः, शायर अपने भाग्य को स्वीकार करता है, अपनी ही सत्ता को उदासी का कारण मानता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे कर गई वाबस्ता-ए-तन मेरी उर्यानी मुझे
पर्दे के पीछे से मुझे अपने दामन को जोश से झाड़ते हुए देखकर, मेरी नग्नता मेरे शरीर से जुड़ गई।
2
बन गया तेग़-ए-निगाह-ए-यार का संग-ए-फ़साँ मर्हबा मैं क्या मुबारक है गिराँ-जानी मुझे
मेरी भारी जान (आत्मा) मेरे महबूब की तलवार-जैसी निगाह के लिए धार लगाने वाला पत्थर बन गई है। वाह! मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मेरी जान इतनी भारी (या सहनशील) है।
3
क्यूँ न हो बे-इल्तिफ़ाती उस की ख़ातिर जम्अ' है जानता है महव-ए-पुर्सिश-हा-ए-पिन्हानी मुझे
उसकी बे-इल्तिफ़ाती क्यों न हो, वह निश्चिंत है। वह जानता है कि मैं उसकी गुप्त पूछताछ में लीन हूँ।
4
मेरे ग़म-ख़ाने की क़िस्मत जब रक़म होने लगी लिख दिया मिन-जुमला-ए-असबाब-ए-वीरानी मुझे
जब मेरे दुःख के घर का भाग्य लिखा जाने लगा, तो मुझे वीरानी (बर्बादी) के कारणों में से एक के रूप में लिख दिया गया।
5
बद-गुमाँ होता है वो काफ़िर न होता काश के इस क़दर ज़ौक़-ए-नवा-ए-मुर्ग़-ए-बुस्तानी मुझे
काश कि वह 'काफ़िर' (महबूब) बदगुमान न होता। मुझे बाग़ के परिंदे के गीत का इस क़दर गहरा शौक है।
6
वाए वाँ भी शोर-ए-महशर ने न दम लेने दिया ले गया था गोर में ज़ौक़-ए-तन-आसानी मुझे
अफ़सोस, वहाँ भी क़यामत के शोर ने मुझे आराम नहीं करने दिया। मैं तो शरीर को आराम देने की इच्छा से क़ब्र में गया था।
7
वा'दा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है तुम ने क्यूँ सौंपी है मेरे घर की दरबानी मुझे
अपने आने का वादा निभाएं, यह कैसा अंदाज़ है? आपने मुझे मेरे ही घर की रखवाली क्यों सौंपी है?
8
हाँ नशात-ए-आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी वाह वाह फिर हुआ है ताज़ा सौदा-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
हाँ, बसंत ऋतु के आगमन की खुशी, वाह वाह! मुझे ग़ज़ल पाठ का शौक फिर से ताज़ा हो गया है।
9
दी मिरे भाई को हक़ ने अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी मीरज़ा यूसुफ़ है 'ग़ालिब' यूसुफ़-ए-सानी मुझे
ईश्वर ने मेरे भाई को फिर से जीवन दिया है। ग़ालिब, मेरे लिए मिर्ज़ा यूसुफ़ दूसरा यूसुफ़ है।
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