ग़ज़ल
दर-ख़ुर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
درخورِ قہر و غضب جب کوئی ہم سا نہ ہوا
यह ग़ज़ल अद्वितीय आत्म-सम्मान और गहन गर्व के विषयों को उजागर करती है, जहाँ शायर अपने दुख और इबादत में भी अपनी अनूठी स्थिति पर ज़ोर देता है, स्वाभिमान को छोड़ने से इनकार करता है। यह सूक्ष्म रूप से यह भी दर्शाती है कि ईश्वरीय या महबूब की अनुपस्थिति के इम्तिहान सहना ही एक विशिष्टता का प्रतीक है, जो नम्रता पर एक अपरंपरागत दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दर-ख़ुर-ए-क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हम सा न हुआ
फिर ग़लत क्या है कि हम सा कोई पैदा न हुआ
जब हमारे जैसा कोई आपके क्रोध और गुस्से के योग्य नहीं पाया गया, तो यह कहना गलत क्या है कि हमारे जैसा कोई पैदा ही नहीं हुआ।
2
बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम
उल्टे फिर आए दर-ए-का'बा अगर वा न हुआ
बंदगी में भी हम इतने आज़ाद और आत्म-अभिमानित हैं कि अगर का'बा का दरवाज़ा हमारे लिए न खुला तो हम वहाँ से उल्टे लौट आएँगे।
3
सब को मक़्बूल है दा'वा तिरी यकताई का
रू-ब-रू कोई बुत-ए-आइना-सीमा न हुआ
सबको तुम्हारी अनूठी होने का दावा स्वीकार्य है, क्योंकि कोई भी आईने जैसे मुख वाला बुत तुम्हारे सामने नहीं आ सका।
4
कम नहीं नाज़िश-ए-हमनामी-ए-चश्म-ए-ख़ूबाँ
तेरा बीमार बुरा क्या है गर अच्छा न हुआ
सुंदरों की आँखों के साथ हमनाम होना कोई कम गर्व की बात नहीं है। इसमें तुम्हारे बीमार का क्या कसूर अगर वह अच्छा न हो सका?
5
सीने का दाग़ है वो नाला कि लब तक न गया
ख़ाक का रिज़्क़ है वो क़तरा कि दरिया न हुआ
वह पुकार जो होठों तक न जा सकी, सीने का एक दाग़ है। वह बूंद जो दरिया न बन सकी, मिट्टी का भोजन है।
6
नाम का मेरे है जो दुख कि किसी को न मिला
काम में मेरे है जो फ़ित्ना कि बरपा न हुआ
जो दुःख मेरे नाम का है, वह किसी और को नहीं मिला। जो फ़ित्ना (उपद्रव) मेरे काम में है, वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ।
7
हर-बुन-ए-मू से दम-ए-ज़िक्र न टपके ख़ूँ नाब
हमज़ा का क़िस्सा हुआ इश्क़ का चर्चा न हुआ
अगर इश्क़ के ज़िक्र पर रोम-रोम से ताज़ा ख़ून न टपके, तो यह सिर्फ़ हमज़ा का क़िस्सा (एक वीरगाथा) हुआ, इश्क़ की असल बात नहीं हुई।
8
क़तरा में दजला दिखाई न दे और जुज़्व में कुल
खेल लड़कों का हुआ दीदा-ए-बीना न हुआ
यदि एक बूँद में दजला नदी न दिखे और एक अंश में पूरा न दिखे, तो यह केवल बच्चों का खेल हुआ, न कि कोई समझदार दृष्टि।
9
थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ
यह ख़बर बहुत गर्म थी कि ग़ालिब के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे। हम भी यह देखने गए थे, परंतु कोई तमाशा नहीं हुआ।
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