ग़ज़ल

चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है

چشمِ خوباں خاموشی میں بھی نوا پرداز ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: है

यह ग़ज़ल महबूब की आँखों की गहरी अभिव्यक्ति और मोहकता का वर्णन करती है, जो ख़ामोशी में भी बहुत कुछ कह जाती हैं, और उनका सुर्मा मानो आवाज़ की लौ का धुआँ हो। यह आशिक़ों के तीव्र दर्द को भी दर्शाता है, जिनके नाले ग्रहों की गर्दिश की तरह गूँजते हैं, और जिनकी समर्पित नज़र, जैसे मजनूँ की, वीरान रेगिस्तानों को भी गुलज़ार में बदल सकती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
चश्म-ए-ख़ूबाँ ख़ामुशी में भी नवा-पर्दाज़ है सुर्मा तो कहवे कि दूद-ए-शो'ला-ए-आवाज़ है
सुंदर आँखों की ख़ामोशी में भी संगीत होता है। सुरमा तो यह कहेगा कि वह आवाज़ के शोले का धुआँ है।
2
पैकर-ए-उश्शाक़ साज़-ए-ताला-ए-ना-साज़ है नाला गोया गर्दिश-ए-सैय्यारा की आवाज़ है
प्रेमियों का शरीर प्रतिकूल भाग्य का वाद्ययंत्र है। उनका विलाप मानों घूमते हुए ग्रहों की आवाज़ है।
3
दस्त-गाह-ए-दीदा-ए-खूँ-बार-ए-मजनूँ देखना यक-बयाबाँ जल्वा-ए-गुल फ़र्श-ए-पा-अंदाज़ है
मजनूँ की खून बरसाने वाली आँखों का प्रभाव देखो। उसके लिए, पूरे रेगिस्तान में फूलों की छटा केवल पैरों के नीचे बिछाने वाला फर्श है।
4
चश्म-ए-ख़ूबाँ मै-फ़रोश-ए-नश्शा-ज़ार-ए-नाज़ है सुर्मा गोया मौज-ए-दूद-ए-शोला-ए-आवाज़ है
सुंदर आँखों में अभिमान के मादक बगीचे की शराब बिकती है। उन आँखों का सुरमा मानो आवाज़ की लौ से उठने वाले धुएँ की लहर है।
5
है सरीर-ए-ख़ामा रेज़िश-हा-ए-इस्तिक़्बाल-ए-नाज़ नामा ख़ुद पैग़ाम को बाल-ओ-पर-ए-परवाज़ है
कलम की सरसराहट नाज़ के स्वागत की बौछारें हैं। पत्र स्वयं संदेश को उड़ने के लिए पंख प्रदान करता है।
6
सर-नाविश्त-ए-इज़्तिराब-अंजामी-ए-उल्फ़त न पूछ नाल-ए-ख़ामा ख़ार-ख़ार-ए-ख़ातिर-ए-आगाज़ है
इश्क़ की बेचैनी से भरे अंजाम वाली किस्मत के बारे में मत पूछो। कलम की आह (चीख) उसके आगाज़ की यादों में एक लगातार चुभने वाला कांटा है।
7
नाला-ए-दिल नग़्मा-रेज़ाँ है ब-मिज़राब-ए-ख़याल रिश्ता-ए-पा याँ नवा-सामान-ए-बंद-ए-साज़ है
दिल का नाला ख़याल के मिज़राब से नग़्मे बिखेर रहा है। यहाँ पैर का बंधन साज़ के तार के लिए संगीत का साधन है।
8
शर्म है तर्ज़-ए-तलाश-ए-इंतिख़ाब-ए-यक-निगाह इज़्तिराब-ए-चश्म बरपा दोख़्ता-ग़म्माज़ है
एक ही नज़र में चुनाव की तलाश का तरीका शर्मनाक है। आँखों की बेचैनी, भले ही छिपी हुई हो, फिर भी राज़ खोल देती है।
9
शोख़ी-ए-इज़्हार को जुज़ वहशत-ए-मजनूँ 'असद' बस-कि लैला-ए-सुख़न महमिल-नशीन-ए-राज़ है
असद, अभिव्यक्ति की चंचलता मजनूं की दीवानगी के सिवा और क्या है? क्योंकि कविता की लैला रहस्यों के पालकी में बैठी है।
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