ग़ज़ल
बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे
باغ پا کر خفقانی یہ ڈراتا ہے مجھے
यह ग़ज़ल गहरे आंतरिक बेचैनी और भय को दर्शाती है, जहाँ एक बाग़ जैसी सुंदर चीज़ भी डरावनी लगती है और गुलाब की टहनी की परछाई साँप जैसी दिखती है। शायर अपने भीतर एक अंतर्निहित, विषैले स्वभाव को महसूस करता है और अपने टूटे दिल को एक चिंतनशील स्थान पर देखे जाने का वर्णन करता है। यह एक गहन उदासी व्यक्त करती है जहाँ असीम दुख अस्तित्व की क्षणभंगुरता के साथ रहता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
बाग़ पा कर ख़फ़क़ानी ये डराता है मुझे
साया-ए-शाख़-ए-गुल अफ़'ई नज़र आता है मुझे
बाग़ पाकर यह उदासी/चिंता मुझे डराती है। गुलाब की डाली की परछाई मुझे साँप जैसी नज़र आती है।
2
जौहर-ए-तेग़ ब-सर-चश्म-ए-दीगर मालूम
हूँ मैं वो सब्ज़ा कि ज़हराब उगाता है मुझे
तलवार का असली जौहर किसी और नज़र से ही मालूम होता है। मैं वह पौधा हूँ जिसे ज़हरीला पानी उगाता है।
3
मुद्द'आ महव-ए-तमाशा-ए-शिकस्त-ए-दिल है
आइना-ख़ाना में कोई लिए जाता है मुझे
मेरा उद्देश्य मेरे दिल के टूटने का तमाशा देखने में खोया हुआ है। कोई मुझे एक आईनाख़ाने में ले जा रहा है।
4
नाला सरमाया-ए-यक-आलम ओ आलम कफ़-ए-ख़ाक
आसमाँ बैज़ा-ए-क़ुमरी नज़र आता है मुझे
मेरा विलाप एक पूरे संसार की पूँजी है, और यह संसार स्वयं एक मुट्ठी धूल के समान है। मुझे आसमान एक कबूतरी के अंडे जैसा नज़र आता है।
5
ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे
देखूँ अब मर गए पर कौन उठाता है मुझे
जीवनकाल में तो वे मुझे अपनी महफ़िलों से उठा देते थे। अब जब मैं मर गया हूँ, तो देखता हूँ कि कौन मुझे उठाता है।
6
बाग़ तुझ बिन गुल-ए-नर्गिस से डराता है मुझे
चाहूँ गर सैर-ए-चमन आँख दिखाता है मुझे
तुम्हारे बिना बाग़ मुझे नरगिस के फूलों से डराता है। अगर मैं बाग़ में टहलना चाहता हूँ, तो वह मुझे आँखें दिखाता है।
7
शोर-ए-तिम्साल है किस रश्क-ए-चमन का या रब
आइना बैज़ा-ए-बुलबुल नज़र आता है मुझे
हे ईश्वर, यह छवियों का शोर किस ऐसे चमन का है जिस पर दूसरे रश्क करते हैं? मुझे आईना बुलबुल के अंडे जैसा नज़र आता है।
8
हैरत-ए-आइना अंजाम-ए-जुनूँ हूँ ज्यूँ शम'
किस क़दर दाग़-ए-जिगर शो'ला उठाता है मुझे
मैं एक मोमबत्ती की तरह हूँ, दीवानगी के अंजाम पर हैरान एक आईना। मेरे दिल के ज़ख्म मेरे लिए कितनी आग पैदा करते हैं।
9
मैं हूँ और हैरत-ए-जावेद मगर ज़ौक़-ए-ख़याल
ब-फ़ुसून-ए-निगह-ए-नाज़ सताता है मुझे
मैं हूँ और मुझ पर हमेशा का आश्चर्य छाया हुआ है, मगर कल्पना का आनंद एक नाज़ुक निगाह के जादू से मुझे सताता रहता है।
10
हैरत-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न साज़-ए-सलामत है 'असद'
दिल पस-ए-ज़ानू-ए-आईना बिठाता है मुझे
हे असद, काव्य विचारों की आश्चर्यजनक क्षमता ही मेरी सुरक्षा का साधन है। मेरा दिल मुझे आईने के घुटने के पीछे बिठा देता है।
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