ग़ज़ल

ब-नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर

بہ نالہ حاصل دل بستگی فراہم کر
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 6 shers· radif: मा'लूम

यह ग़ज़ल विलाप और दिल की क़ैद के गहरे संबंध को दर्शाती है, यह सुझाव देती है कि गहरा दुःख एक अनूठी वास्तविकता को प्रकट कर सकता है, जहाँ शायद केवल दर्द की गूँज ही वास्तव में मौजूद हो। यह यह भी बताती है कि प्रेम की अभिव्यक्ति प्रेमी के साहस के अनुपात में होती है, चेतावनी देते हुए कि इसके बिना, अस्तित्व केवल एक भ्रामक "आइनों का घर" ही रह जाता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ब-नाला हासिल-ए-दिल-बस्तगी फ़राहम कर मता-ए-ख़ाना-ए-ज़ंजीर जुज़ सदा मा'लूम
नालों से दिल के बंधे होने का परिणाम इकट्ठा कर; ज़ंजीर के घर का सामान आवाज़ के सिवा कुछ नहीं मालूम होता।
2
ब-क़द्र-ए-हौसला-ए-इश्क़ जल्वा-रेज़ी है वगर्ना ख़ाना-ए-आईना की फ़ज़ा मा'लूम
सौंदर्य का प्रकटीकरण प्रेम के हौसले के अनुसार ही होता है, अन्यथा शीशे के घर का हाल (कि वह केवल दिखाता है, कुछ रखता नहीं) तो मालूम ही है।
3
बहार दर-गिरौ-ए-ग़ुंचा शहर-ए-जौलाँ है तिलिस्म-ए-नाज़ ब-जुज़ तंगी-ए-क़बा मा'लूम
बहार कली के पास गिरवी है, जो एक विचरण का शहर है। नाज़ का तिलिस्म लिबास की तंगी के सिवा कुछ और नहीं जाना जाता।
4
तिलिस्म-ए-ख़ाक कमीं-गाह-ए-यक-जहाँ सौदा ब-मर्ग तकिया-ए-आसाइश-ए-फ़ना मा'लूम
धूल का जादू, एक पूरे जहाँ के जूनून का छिपा हुआ स्थान। मृत्यु ही फ़ना के आराम का तकिया मालूम होती है।
5
तकल्लुफ़ आइना-ए-दो-जहाँ मदारा है सुराग़-ए-यक-न-गह-ए-क़हर-आश्ना मा'लूम
औपचारिकता दोनों जहानों का ऐसा आइना है जो दिखावे या शिष्टाचार से भरा है। अचानक आने वाले, क्रोध से परिचित एक झलक का सुराग़ मालूम होता है।
6
'असद' फ़रेफ्ता-ए-इंतिख़ाब-ए-तर्ज़-ए-जफ़ा वगर्ना दिलबरी-ए-वादा-ए-वफ़ा मा'लूम
असद, ज़ुल्म के तरीके के चुनाव पर मोहित है, अन्यथा वफ़ा के वादे का आकर्षण तो मालूम ही है।
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