ग़ज़ल

आ मिल यार

آ مِل یار
बुल्ले शाह· Ghazal· 5 shers

यह ग़ज़ल प्रेम और आस्था के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है। कवि कहता है कि सच्चा प्रेम किसी धर्म या जाति का मोहताज नहीं होता, और यह समाज के झूठे आडंबरों और छल-कपट पर सवाल उठाता है। यह मानव मन की जटिलताओं और सच्चाई की खोज पर प्रकाश डालती है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
اندر خواب وچھوڑا ہویا، خبر نہ پیندی تیری
अंदर ख़्वाब विछोड़ा होइआ, ख़बर ना पैंदी तेरी
स्वप्न की गहराई में, मेरा प्रियजन खो गया है, मुझे तेरा पता नहीं चलता।
2
مُلّاں قاضی راہ بتاون، دین دھرم دے پھیرے ایہہ تاں ٹھگ جگت دے جھاڑ، لاون جال چوفیرے
मुल्लां क़ाज़ी राह बतावण, दीन धरम दे फेरे एह तां ठग जगत दे झाड़, लावण जाल चुफेरे
मुल्लान काज़ी, राह बतावाण, दीन-धर्म के फेरे। ऐ तान ठग जुगाट दे जार, लावाणजाल चुफरे।
3
کرم شرع دے دھرم بتاون، سنگل پاون پیریں ذات مذہب ایہہ عشق نہ پُچھدا، عشق شرع دا ویری
करम शरह दे धरम बतावण, संगल पावण पैरीं ज़ात मज़हब एह इश्क़ ना पुछदा, इश्क़ शरह दा वैरी
कर्म से धर्म बताएगा, जंगल पवन परेन। ज़ात मजहब ये इश्क़ न पूछता, इश्क़ शरा का वेरी।
4
ندیؤں پار اے ملک سجن دا، لہر لوبھ نے گھیری ستگُر بیڑی پھڑھی کھلوتے، تیں کیوں لائی اویرے
नदीओं पार ए मुल्क सजन दा, लहर लोभ ने घेरी सतगुर बेड़ी फड़ी खलोते, तैं क्यों लाई अवेरे
नदियों के पार आए प्रिय देश, तुम्हारी लहरों में गहराई नहीं है; तुम मनमोहक वस्त्र पहनकर यहाँ क्यों आती हो।
5
بُلّھے شاہ، شوہ تینوں مِلسی، دل نوں دے دلیری پریتم پاس تے ٹولنا کِس نوں؟ بھلّیوں سکھر دوپہرے
बुल्ल्हे शाह, शौह तैनूं मिलसी, दिल नूं दे दिलेरी प्रीतम पास ते टोलना किस नूं? भुल्लिओ सखर दुपहरे
बुल्ले शाह, आपका शरीर एक रहस्य है; आपका दिल एक निरंतर संघर्ष है। प्रियतम की निकटता को प्रेम की तराजू से तौलना, ग्रीष्म दोपहर में बादल के गुजरने जैसा है।
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