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ग़ज़ल

ઇશારોય કેવો મભમ થઈ ગયો છે

इशाराय केवो मभम हो गयो है
अमृत घायल· Ghazal· 13 shers

यह ग़ज़ल किसी गहरे और रहस्यमय एहसास को बयां करती है, जहाँ कवि को अपनी भावनाओं के इज़हार में एक अजीब-सा मज़ा और विस्मय महसूस होता है। यह इश्क़ की उस अवस्था का वर्णन है जो न केवल दिल को छूती है, बल्कि मन को भी एक अनजाने सफर पर ले जाती है।

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ઇશારોય કેવો મભમ થઈ ગયો છે! અગમ થઈ ગયો છે, નિગમ થઈ ગયો છે.
इशारा ही कैसा मुभम हो गया है! अगम हो गया है, निगम हो गया है।
संकेत ही कितना अस्पष्ट हो गया है! वह अगम्य हो गया है, और साथ ही ज्ञात भी हो गया है।
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