न हों क्यों दर्दीली ‘घायल’ की गज़लें? दर्द में ही पागल ख़त्म हो गया है।

“Why wouldn't 'Ghayal's' ghazals be full of pain? The madman himself has perished within the pain.”

— अमृत घायल
अर्थ

घायल की ग़ज़लें दर्द से भरी क्यों न हों? पागल (कवि) तो दर्द में ही समाप्त हो गया है।

विस्तार

यह दोहा बताता है कि कवि 'घायल' की ग़ज़लें इतनी दर्द भरी क्यों हैं। कवि खुद इसका जवाब देते हैं: वे खुद इतने गहरे दर्द में डूबे थे कि उनका पूरा अस्तित्व उसी पीड़ा में समा गया और खत्म हो गया। उनका जीवन इस गहरी वेदना से पूरी तरह परिभाषित हुआ और अंततः उसी में समाप्त हो गया। इसलिए, यह स्वाभाविक है कि उनकी कविता, जो उनके अस्तित्व के मूल से आती है, इसी तीव्र वेदना को दर्शाए। उनकी ग़ज़लें केवल दर्द के बारे में नहीं हैं; वे स्वयं दर्द का मूर्त रूप हैं, जो उनके दर्द में डूबे जीवन का सीधा परिणाम हैं।

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