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ग़ज़ल

કારણ મને ગમે છે

કારણ મને ગમે છે
अमृत घायल· Ghazal· 13 shers

यह ग़ज़ल प्रेम की नशीली और रहस्यमय दुनिया का वर्णन करती है, जहाँ शायर जीवन के हर पहलू में एक अलौकिक आकर्षण महसूस करता है। इसमें भावनाओं की गहराई और अस्तित्व के जटिल धागों को काव्यात्मक ढंग से पिरोया गया है।

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આવી ગયાં છો આંસુ લૂછો નહીં ભલા થઈ, એ બારે માસ લીલાં તોરણ મને ગમે છે.
आँसू आ चुके हैं, इन्हें पोंछो नहीं, भले हो तुम,वे बारहों मास हरे तोरण मुझे भाते हैं।
कवि कहता है कि आँसू आ गए हैं, उन्हें पोंछो नहीं, भले बनो, क्योंकि वे बारह मास हरे रहने वाले तोरण की तरह मुझे अच्छे लगते हैं।
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દિલ શું હવે હું પાછી દુનિયાય પણ નહીં દઉં, એ પણ મને ગમે છે, આ પણ મને ગમે છે.
दिल क्या अब मैं वापस दुनिया भी नहीं दूंगा, वो भी मुझे पसंद है, ये भी मुझे पसंद है।
कवि पूछता है कि क्या अब वह अपना दिल, या फिर दुनिया भी वापस नहीं देगा, क्योंकि उसे वह भी पसंद है और यह भी पसंद है।
11
હસવું અચૂક હસવું, દુઃખમાંય મુક્ત હસવું, દીવાનગી તણું આ ડહાપણ મને ગમે છે.
हँसना अचूक हँसना, दुःख में भी मुक्त हँसना,दीवानगी का यह डहापन मुझे भाता है।
व्यक्ति को निश्चित रूप से और खुलकर हँसना चाहिए, यहाँ तक कि दुख में भी बेपरवाह होकर हँसना चाहिए। मुझे पागलपन की यह बुद्धिमत्ता बहुत भाती है।
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