ग़ज़ल

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ

زحال مسکیں مکن تغافل دورائے نیناں بنائے بتیاں

अमीर खुसरो द्वारा रचित यह प्रसिद्ध ग़ज़ल फ़ारसी और ब्रजभाषा के अनूठे संगम के ज़रिये विरह की गहरी वेदना और तड़प को अभिव्यक्त करती है। इसमें प्रेमी अपने प्रियतम से उपेक्षा न बरतने की मिन्नत करता है और जुदाई की लंबी, कष्टदायी रातों के असहनीय दर्द को बयां करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ
मेरी बेबस हालत को नज़रअंदाज़ करके आँखें मत चुराओ और बहाने मत बनाओ; क्योंकि मुझमें जुदाई सहने की ताक़त नहीं बची है, ऐ जान, तुम मुझे अपने सीने से क्यों नहीं लगा लेते?
2
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ
जुदाई की रातें ज़ुल्फ़ों की तरह लंबी हैं और मिलन का दिन ज़िंदगी की तरह छोटा है। हे सखी, यदि मैं अपने प्रियतम को न देखूँ, तो ये अंधेरी रातें कैसे बिताऊँ?
3
यकायक अज़ दिल दो चश्म जादू ब-सद-फ़रेबम ब-बुर्द तस्कीं किसे पड़ी है जो जा सुनावे पियारे पी को हमारी बतियाँ
अचानक उन दो जादुई आँखों ने सैकड़ों छलों से मेरे दिल का चैन छीन लिया। अब भला किसे परवाह है जो जाकर मेरे प्रियतम को मेरा हाल और बातें सुनाए?
4
चूँ शम-ए-सोज़ाँ चूँ ज़र्रा हैराँ ज़ मेहर-ए-आँ-मह बगश्तम आख़िर न नींद नैनाँ न अंग चैनाँ न आप आवे न भेजे पतियाँ
उस चाँद जैसे महबूब की मुहब्बत में आख़िरकार मैं जलती हुई मोमबत्ती और हैरान ज़र्रे की तरह हो गया हूँ। अब न मेरी आँखों में नींद है और न बदन में चैन, न वह ख़ुद आते हैं और न ही कोई ख़त भेजते हैं।
5
ब-हक़्क़-ए-आँ मह कि रोज़-ए-महशर ब-दाद मारा फ़रेब 'ख़ुसरव' सपीत मन के दुराय राखूँ जो जाए पाऊँ पिया की खतियाँ
मुझे उस चाँद जैसे महबूब की क़सम जिसने क़यामत के दिन ख़ुसरव को धोखा दिया, कि अगर मुझे अपने प्रियतम का कोई ख़त मिल जाए, तो मैं उसे अपने पवित्र दिल में छिपाकर रख लूँगा।
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