शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़ ओ रोज़-ए-वसलत चूँ उम्र-ए-कोताह सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

“The nights of parting stretch as long as tresses, while the day of union is as fleeting as life; O dear friend, if I behold not my beloved, how shall I endure these dark and lonely nights?”

— अमीर ख़ुसरो
अर्थ

जुदाई की रातें ज़ुल्फ़ों की तरह लंबी हैं और मिलन का दिन ज़िंदगी की तरह छोटा है। हे सखी, यदि मैं अपने प्रियतम को न देखूँ, तो ये अंधेरी रातें कैसे बिताऊँ?

विस्तार

अमीर ख़ुसरो ने इस शेर में फ़ारसी और ब्रजभाषा को मिलाकर वियोग और मिलन के समय का बड़ा ही खूबसूरत फ़र्क दिखाया है। जुदाई की रातें महबूब की लंबी ज़ुल्फ़ों की तरह कभी न ख़त्म होने वाली लगती हैं, जबकि मिलन का दिन ज़िंदगी की तरह पलक झपकते ही गुज़र जाता है। अपनी सखी से दिल का दर्द बाँटते हुए आशिक़ पूछता है कि जब पिया ही सामने न हों, तो इन काली, डरावनी और तन्हा रातों को भला कोई कैसे काटे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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