ग़ज़ल

हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए

حشر تک یاں دل شکیبا چاہئے
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 9 shers· radif: चाहिए

यह ग़ज़ल प्रेम में अपेक्षित अनंत धैर्य और मिलन की अनिश्चित प्रतीक्षा को व्यक्त करती है। इसमें शायर महबूब के अलौकिक सौंदर्य और ईश्वरीय तजल्ली के उस रहस्यमयी रूप पर विचार करता है, जिसे सामान्य मानवीय आँखों से देख पाना असंभव है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए कब मिलें दिलबर से देखा चाहिए
2
है तजल्ली भी नक़ाब-ए-रू-ए-यार उस को किन आँखों से देखा चाहिए
3
ग़ैर-मुमकिन है न हो तासीर-ए-ग़म हाल-ए-दिल फिर उस को लिक्खा चाहिए
4
है दिल-अफ़गारों की दिलदारी ज़रूर गर नहीं उल्फ़त मदारा चाहिए
5
है कुछ इक बाक़ी ख़लिश उम्मीद की ये भी मिट जाए तो फिर क्या चाहिए
6
दोस्तों की भी न हो परवा जिसे बे-नियाज़ी उस की देखा चाहिए
7
भा गए हैं आप के अंदाज़ ओ नाज़ कीजिए इग़्माज़ जितना चाहिए
8
शैख़ है इन की निगह जादू भरी सोहबत-ए-रिंदाँ से बचना चाहिए
9
लग गई चुप 'हाली'-ए-रंजूर को हाल इस का किस से पूछा चाहिए
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हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए | Sukhan AI