“One who cares not even for friends / Behold, such supreme indifference must be seen!”
जिसे अपने दोस्तों की भी परवाह न हो, उस व्यक्ति की बेपरवाही या बेरुखी देखने लायक है।
इस शेर में शायर महबूब की उस बेरुखी और बेपरवाही पर हैरान भी है और हल्का सा तंज़ भी कर रहा है, जहाँ उसे अपने अज़ीज़ दोस्तों की भी कोई फ़िक्र नहीं रहती। यहाँ 'बे-नियाज़ी' महज़ बेदिली नहीं, बल्कि एक ऐसा गहरा बे-ताल्लुक़ी का अंदाज़ है जो इंसान को दुनिया के हर रिश्ते से बेपरवाह कर देता है। चोट खाए दिल के बावजूद शायर इस अदा पर फ़िदा होकर कहता है कि ऐसी मुकम्मल बे-परवाही भी सचमुच देखने के क़ाबिल है।
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