ग़ज़ल

બારે માસ ભોગવે એ બે

બારે માસ ભોગવે એ બે
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह गज़ल धारणा की भ्रामक प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ दृश्यमान रूपों के पीछे एक अदृश्य सार निहित है। यह एक बारहमासी अनुभव की बात करती है जो हर जगह व्याप्त है, एक गहन माया या सत्य का सुझाव देती है। बेल के बजाय पत्तियां देखने, या धारा के बजाय लहरें देखने जैसी उपमाओं के माध्यम से, कवि यह उजागर करते हैं कि भौतिक शरीर को कैसे देखा जाता है जबकि सच्ची चेतना छिपी रहती है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
બારે માસ ભોગવે એ બે સૌને ઘેર આવી ગઇ રહે ;
वे दोनों पूरे साल आनंद लेते हैं, और हर घर में वे पास रहते हैं।
2
અખા હરિ જાણે જડ જાય નૈં તો મનસા વાચા પેશીરે ક્યાંય.
अखा कहते हैं कि जब हरि को जाना जाता है, तब जड़ता दूर हो जाती है। अन्यथा, मन या वचन कहीं भी प्रवेश नहीं कर सकते।
3
વેલ ન દીસે દીસે પાન દીસે કીરણ ન દીસે ભાન;
बेल नहीं दिखती, पत्ते दिखते हैं; किरणें दिखती हैं, सूरज नहीं दिखता।
4
પ્રવાહ ન દીસે દીસે તરંગ તેમ ચિદ ન દીસે દીસે અંગ
जैसे पानी का प्रवाह नहीं दिखता, बल्कि उसकी लहर दिखती है; वैसे ही चेतना नहीं दिखती, बल्कि शरीर दिखता है।
5
અખા દે ખણહારો દ્વત ટળતે રહે તે સર્વાતીત.
अखा कहते हैं कि जो द्वैत को देखता है और उसे पार कर लेता है, वह सर्वातीत हो जाता है, यानी सभी से परे है।
6
ઉંચ ખરા તે ઉંચ ન જાણ નીચ તે નોહે નીચ નિર્વાણ;
उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को श्रेष्ठ न समझें, और न ही निम्न पद वाले को नीच मानें। किसी की सच्ची योग्यता उसकी सामाजिक स्थिति से नहीं बल्कि उसके गुणों से होती है।
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