समझ हो जिस की बलीग़ समझे नज़र हो जिस की वसीअ' देखे अभी यहाँ ख़ाक भी उड़ेगी जहाँ ये क़ुल्ज़ुम उबल रहा है

“Let those with ripe discernment grasp, let those with expansive vision see: dust will soon scatter and blow right here, where this ocean seethes today.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

जिसकी समझ गहरी हो वह समझे और जिसकी दृष्टि व्यापक हो वह देखे, कि जहाँ आज यह समुद्र उफन रहा है, बहुत जल्द वहाँ केवल धूल उड़ेगी।

विस्तार

इस शेर में शायर उफ़नते समंदर (क़ुल्ज़ुम) और वीराने की धूल (ख़ाक) के ज़रिए वक़्त और ज़िंदगी की नश्वरता का गहरा फलसफ़ा पेश करते हैं। वो कहते हैं कि गहरी समझ और दूरंदेश नज़र ही यह देख सकती है कि आज जहाँ शान-ओ-शौकत या ताक़त का तूफ़ान उमड़ रहा है, कल वहाँ सिर्फ़ सन्नाटा और वीरानी होगी। यह शेर हमें याद दिलाता है कि समय के आगे बड़ी से बड़ी बुलंदी भी रेत की तरह बिखर जाती है, इसलिए आज के ठाठ-बाट पर ग़ुरूर करने के बजाय ज़िंदगी की हक़ीक़त को पहचानना चाहिए।

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