ये देखते हो जो कासा-ए-सर ग़ुरूर-ए-ग़फ़लत से कल था ममलू यही बदन नाज़ से पला था जो आज मिट्टी में गल रहा है

“This skull you see before you now was brimmed with heedless pride just yesterday; this very flesh, once reared in luxury, now rots to dust in common clay.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

यह जो सिर की खोपड़ी तुम देख रहे हो, यह कल तक घमंड और बेपरवाही से भरी हुई थी, और यही शरीर जो कभी बड़े लाड़-प्यार से पला था, आज मिट्टी में गल रहा है।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी की नश्वरता और इंसानी ग़ुरूर के खोखलेपन को बड़ी गहराई से सामने लाता है। शायर एक खोपड़ी की तरफ़ इशारा करते हुए कहता है कि कल तक यह दिमाग़ घमंड और बेपरवाही से भरा हुआ था, और जिस बदन को इतने नाज़-ओ-नख़रों से पाला गया था, वह आज ख़ामोशी से मिट्टी में मिल रहा है। यह हमें याद दिलाता है कि दुनिया की शान-ओ-शौकत और जिस्म पर इतराना बेमानी है, क्योंकि मौत के आगे सब मिट्टी ही हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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