“Why turn the Civil Surgeon away, my dear friend? A matter of prestige is at stake, whether a cure comes or not.”
ऐ दोस्त, तुम सिविल सर्जन के आने को क्यों रोकते हो? इसमें प्रतिष्ठा की बात है, चाहे मरीज़ को शिफ़ा मिले या न मिले।
यह शेर अकबर इलाहाबादी के उस तीखे मगर मुस्कुराते हुए अंदाज़ की मिसाल है, जहाँ वे झूठी शान-ओ-शौकत पर तंज़ कसते हैं। शायर अपने दोस्त से कहता है कि बड़े अंग्रेज़ अफ़सर यानी 'सिवल सर्जन' को आने से मत रोको, क्योंकि इससे समाज में रुतबा और इज़्ज़त (ऑनर) बढ़ती है, भले ही मरीज़ को आराम मिले या न मिले। यहाँ असल दर्द की दवा से ज़्यादा दिखावे की बीमारी पर चोट की गई है, जो आज के दौर पर भी उतनी ही खरी उतरती है।
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