غزل
پرسش جو ہوگی تجھ سے جلاد کیا کرے گا
پرسش جو ہوگی تجھ سے جلاد کیا کرے گا
یہ غزل عشق، ایثار اور عفو و درگزر کے بلند جذبوں کی عکاس ہے۔ اس میں عاشق اپنے قاتل کو معاف کر کے ستم گری کی بے بسی کو نمایاں کرتا ہے، جہاں سچی محبت کا پرسکون جذبہ ظلم کے مقابلے میں اخلاقی فتح پا لیتا ہے۔
Source: rekhta · HI
نغمہ سنیں
ابھی نغمہ نہیں
1
पुर्सिश जो होगी तुझ से जल्लाद क्या करेगा
ले ख़ून मैं ने बख़्शा तू याद क्या करेगा
پرسش جو ہوگی تجھ سے جلاد کیا کرے گا
لے خون میں نے بخشا تو یاد کیا کرے گا
2
हूँ दाम में पुर-अफ़्शाँ और सादगी से हैराँ
क्यूँ तेज़ की हैं छुरियाँ सय्याद क्या करेगा
ہوں دام میں پر افشاں اور سادگی سے حیراں
کیوں تیز کی ہیں چھریاں صیاد کیا کرے گا
3
ज़ालिम ये सोच कर अब देता है बोसा-ए-लब
जब होंट सी दिए फिर फ़रियाद क्या करेगा
ظالم یہ سوچ کر اب دیتا ہے بوسۂ لب
جب ہونٹ سی دیئے پھر فریاد کیا کرے گا
4
ज़ंजीर तार-ए-दामाँ है तौक़ इक गरेबाँ
ज़ोर-ए-जुनूँ न कम हो हद्दाद क्या करेगा
زنجیر تار داماں ہے طوق اک گریباں
زور جنوں نہ کم ہو حداد کیا کرے گا
5
हम डूब कर मरेंगे हसरत रहेगी तुझ को
जब ख़ाक ही न होगी बर्बाद क्या करेगा
ہم ڈوب کر مریں گے حسرت رہے گی تجھ کو
جب خاک ہی نہ ہوگی برباد کیا کرے گا
6
याक़ूब क़त्अ कर दें उम्मीद-ए-वस्ल दिल से
यूसुफ़ सा बंदा कोई आज़ाद क्या करेगा
یعقوب قطع کر دیں امید وصل دل سے
یوسف سا بندہ کوئی آزاد کیا کرے گا
7
दिल ले के पूछता है तू किस का शेफ़्ता है
भूला अभी से ज़ालिम फिर याद क्या करेगा
دل لے کے پوچھتا ہے تو کس کا شیفتہ ہے
بھولا ابھی سے ظالم پھر یاد کیا کرے گا
8
ऐ ख़त्त-ए-ब्याज़ आरिज़ दरकार है जो तुझ को
तहरीर हुस्न की कुछ रूदाद क्या करेगा
اے خط بیاض عارض درکار ہے جو تجھ کو
تحریر حسن کی کچھ روداد کیا کرے گا
9
कुंज-ए-क़फ़स से इक दिन होगी रिहाई अपनी
मर जाएँगे तो आख़िर सय्याद किया करेगा
کنج قفس سے اک دن ہوگی رہائی اپنی
مر جائیں گے تو آخر صیاد کیا کرے گا
10
मिस्ल-ए-सिपंद दिल है बेताब सोज़-ए-ग़म में
रह जाएगा तड़प कर फ़रियाद क्या करेगा
مثل سپند دل ہے بیتاب سوز غم میں
رہ جائے گا تڑپ کر فریاد کیا کرے گا
11
ऐ शैख़ भर गया है क्यूँ वाज़ की हवा में
रीश-ए-सफ़ेद अपनी बर्बाद क्या करेगा
اے شیخ بھر گیا ہے کیوں وعظ کی ہوا میں
ریش سفید اپنی برباد کیا کرے گا
12
ज़ुल्म-ओ-सितम से भी अब ज़ालिम ने हाथ खींचा
इस से सितम वो बढ़ कर ईजाद क्या करेगा
ظلم و ستم سے بھی اب ظالم نے ہاتھ کھینچا
اس سے ستم وہ بڑھ کر ایجاد کیا کرے گا
13
अज़-बस-कि बे-हुनर हूँ मैं नंग-ए-मो'तरिज़ हूँ
मज़मूँ पे मेरे कोई ईराद क्या करेगा
ازبسکہ بے ہنر ہوں میں ننگ معترض ہوں
مضموں پہ میرے کوئی ایراد کیا کرے گا
14
ऐ ''नज़्म'' जिस को चाहे वो दे बहिश्त दोज़ख़
नमरूद क्या करेगा शद्दाद क्या करेगा
اے نظمؔ جس کو چاہے وہ دے بہشت دوزخ
نمرود کیا کرے گا شداد کیا کرے گا
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
