नाला-ओ-आह की तफ़्सील न पूछो मुझ सूँ — वली दकनी
“Ask not of me the details of every lament and sigh; a whole chronicle of pain is compiled within the tome of love.”
अर्थ
मुझसे मेरी आहों और चीखों का ब्योरा मत पूछो; इश्क़ की इस किताब में तो दर्द का पूरा दफ़्तर समाया हुआ है।
विस्तार
शायर बड़ी सादगी से कहता है कि मुझसे मेरी हर आह और फ़रियाद का अलग-अलग हिसाब मत पूछो, क्योंकि यह दर्द किसी एक बात का मोहताज नहीं है। उसने इश्क़ को एक ऐसी मुकम्मल किताब या दफ़्तर बता दिया है, जिसके हर सफ़े पर बस तकलीफ़ और कसक की दास्तान दर्ज है। इस ख़ूबसूरत इस्तेआरे से वह अपने बिखरे हुए आंसुओं को महज़ रोना-धोना न मानकर, इश्क़ का एक बाक़ायदा और गहरा दीवान बना देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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