याद आता है मुझे वो दो गुल-ए-बाग़-ए-वफ़ा — वली दकनी

याद आता है मुझे वो दो गुल-ए-बाग़-ए-वफ़ा अश्क करते हैं मकाँ गोशा-ए-दामान में आ

“I remember those two blossoms from fidelity's garden bower; In the corner of my hem, tears arrive and make their home.”

— वली दकनी

अर्थ

जब मुझे वफ़ा के बाग़ के वे दो फूल याद आते हैं, तो आँसू आकर मेरे दामन के कोने में अपना बसेरा बना लेते हैं।

विस्तार

शायर यहाँ वफ़ा के चमन से जुड़े किसी बेहद अज़ीज़ रिश्ते को 'दो फूलों' की तरह याद कर रहा है। उनकी याद इतनी गहरी और असरदार है कि आते ही आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं और दामन के कोने में अपना आशियाना बना लेते हैं। यह शेर बिछोह के उस दर्द को बड़ी नज़ाकत से बयां करता है, जहाँ रोना महज़ पल भर का नहीं बल्कि यादों के साथ ज़िंदगी भर का बसेरा बन जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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