यक नुक़्ता तिरे सफ़्हा-ए-रुख़ पर नईं बेजा — वली दकनी

यक नुक़्ता तिरे सफ़्हा-ए-रुख़ पर नईं बेजा इस मुख को तिरे सफ़्हा-ए-क़ुरआँ सूँ कहूँगा

“That single dot upon the page of your cheek is not misplaced; I shall liken this radiant face of yours to a page of the Quran.”

— वली दकनी

अर्थ

तुम्हारे चेहरे रूपी पन्ने पर यह एक तिल बिल्कुल भी बेजा नहीं है; मैं तुम्हारे इस मुखड़े की तुलना क़ुरआन के एक पन्ने से करूँगा।

विस्तार

शायर यहाँ माशूक़ के चेहरे पर मौजूद तिल की तारीफ़ बड़े ही अनोखे और पाकीज़ा अंदाज़ में कर रहे हैं। वे चेहरे को एक किताब के पन्ने और तिल को उस पर लगे एक बिंदु (नुक़्ते) जैसा बताते हैं, जो बिल्कुल सही जगह पर सज़ा हुआ है। इस हुस्न और तवाज़ुन को देखकर वे महबूब के चेहरे की तुलना क़ुरआन की मुक़द्दस आयतों वाले सफ़हे से करते हैं, जहाँ एक भी नुक्ता बेमानी नहीं होता।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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