जलता हूँ शब-ओ-रोज़ तिरे ग़म में ऐ साजन — वली दकनी
“Night and day I burn in sorrow for you, O beloved; this searing flame of yours I shall recount to the blazing torch.”
अर्थ
ऐ साजन, मैं तुम्हारे दुख में रात-दिन जलता हूँ। तुम्हारे इस विरह की तपन को मैं जलती हुई मशाल से कहूँगा।
विस्तार
शायर यहाँ जुदाई के उस बेइंतहा दर्द को बयां कर रहे हैं, जो उन्हें दिन-रात अंदर ही अंदर दहका रहा है। इस आग का आलम यह है कि कोई आम इंसान उनके दिल की तपिश नहीं समझ सकता, इसलिए वे अपना हाल-ए-दिल एक जलती हुई मशाल से बांटना चाहते हैं। यह ख़ूबसूरत ख़्याल दिखाता है कि जब मोहब्बत की तड़प हद से गुज़र जाए, तो दर्द का सच्चा हमराज़ सिर्फ़ वही हो सकता है जो ख़ुद भी उसी आग में जल रहा हो।
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