मुझ पर न करो ज़ुल्म तुम ऐ लैली-ए-ख़ूबाँ — वली दकनी
“Do not torment me so, O Layla of the fair; I am Majnun—to the wilderness I shall confide this grief I bear.”
अर्थ
ऐ सुंदरियों की लैला, मुझ पर ज़ुल्म मत करो। मैं मजनूँ हूँ और तुम्हारे दिए ग़म की दास्तान वीराने (जंगल) से कहूँगा।
विस्तार
इस शेर में आशिक़ लैला और मजनूँ के अमर क़िस्से का सहारा लेकर अपने दिल की तड़प बयां कर रहा है। वह अपनी माशूक़ को हुस्न की मल्लिका 'लैली' पुकारता है और ख़ुद को मजनूँ मानते हुए उस पर ज़ुल्म न करने की इल्तिजा करता है। उसका दर्द इतना गहरा है कि अगर महबूब ने रहम न किया, तो वह दुनिया की बस्ती छोड़कर सहरा की तरफ़ निकल जाएगा और वीराने से अपने दिल का ग़म कहेगा।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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