गर नईं राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह — वली दकनी

गर नईं राज़-ए-इश्क़ सूँ आगाह फ़ख़्र बेजा है फ़ख़्र-ए-राज़ी का

“If one remains unacquainted with the mystery of love, in vain is all the scholar's boast and the pride of Fakhr al-Razi.”

— वली दकनी

अर्थ

यदि कोई प्रेम के रहस्य से परिचित नहीं है, तो फ़ख़्र-ए-राज़ी जैसे महान विद्वान का भी सारा घमंड और गर्व व्यर्थ है।

विस्तार

इस शेर में शायर ने लफ़्ज़ 'फ़ख़्र' (गर्व) का बहुत ख़ूबसूरत इस्तेमाल करते हुए मशहूर दार्शनिक और आलिम इमाम फ़ख़रुद्दीन राज़ी का ज़िक्र छेड़ा है। उनका कहना है कि इंसान चाहे कितनी भी किताबें पढ़ ले और तर्कशास्त्र का माहिर बन जाए, अगर उसका दिल इश्क़ के राज़ से नावाक़िफ़ है, तो उसका सारा इल्म और ग़ुरूर फ़िज़ूल है। सच्ची दानाई दिमाग़ की पोथियों में नहीं, बल्कि मोहब्बत के रूहानी एहसास में छुपी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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