ग़ज़ल
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी
تو دیالو، دین ہوں، تو دانی، ہوں بھکاری
इस पद में भक्त अत्यंत विनम्रता और अनन्य भाव से ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण व्यक्त करता है। वह प्रभु की असीम दयालुता और उद्धारक स्वरूप के सम्मुख अपनी दीनता और दुर्बलताओं को रखकर कृपा और शरण की याचना करता है।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
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1
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी ।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पापपुंज-हारी ॥
हे प्रभु, आप दयालु हैं और मैं दीन हूँ, आप परम दानी हैं और मैं भिखारी हूँ। मैं एक विख्यात पापी हूँ और आप समस्त पापों के समूह को नष्ट करने वाले हैं।
2
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो ?
मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसो ॥
हे प्रभु! आप अनाथों और बेसहारा लोगों के स्वामी हैं, और मेरे जैसा अनाथ कौन होगा? मेरे समान कोई संकटग्रस्त नहीं है और आपके जैसा दुखों को दूर करने वाला कोई नहीं है।
3
ब्रह्म तू, हौं जीव, तुही ठाकुर, हौं चेरो ।
तात,मात,गुरु,सखा तू सब बिधि हितु मेरो॥
हे प्रभु, आप परब्रह्म हैं और मैं जीव हूँ; आप स्वामी हैं और मैं आपका सेवक हूँ। आप ही मेरे पिता, माता, गुरु और सखा हैं तथा हर प्रकार से मेरे हितैषी हैं।
4
तोहिं मोहिं नाते अनेक मानिये जो भावै ।
ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥
हे कृपालु! आपके और मेरे बीच अनेक रिश्ते हैं, आपको जो भी पसंद हो उसे स्वीकार कर लीजिए; तुलसीदास को तो बस किसी भी तरह आपके चरणों में शरण मिल जाए।
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