तोहिं मोहिं नाते अनेक मानिये जो भावै । ज्यों त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥

“Between You and me lie countless ties, accept whichever pleases Thee; by any means, O Merciful Lord, may Tulsi find refuge at Thy feet.”

— तुलसीदास
अर्थ

हे कृपालु! आपके और मेरे बीच अनेक रिश्ते हैं, आपको जो भी पसंद हो उसे स्वीकार कर लीजिए; तुलसीदास को तो बस किसी भी तरह आपके चरणों में शरण मिल जाए।

विस्तार

इस पद में संत तुलसीदास जी भगवान के प्रति अपना सहज और गहरा समर्पण व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि हे कृपालु प्रभु, आपके और मेरे बीच अनगिनत नाते हैं। आप मुझे जिस रूप में भी स्वीकार करना चाहें, चाहे सेवक, मित्र या संतान, मुझे सब स्वीकार है। रिश्ते का नाम कोई भी हो, मेरी बस एक ही कामना है कि किसी भी प्रकार मुझे आपके पावन चरणों की शरण मिल जाए। यह दोहा हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति किसी दिखावे या नियम की मोहताज नहीं होती। जब हृदय में सच्चा प्रेम और समर्पण हो, तो ईश्वर हर रिश्ते को अपना लेते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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