ग़ज़ल
श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण-भवभय-दारुणं
شری رام چندر کرپالو بھجو من ہرن بھو بھے دارنم
यह स्तुति कृपालु भगवान श्रीराम के दिव्य सौंदर्य और उनकी करुणा का भावपूर्ण गुणगान करती है। इसमें मन को संसार के समस्त भयों का निवारण करने वाले, कमल-नयन और अनुपम छवि वाले प्रभु की भक्ति में लीन होने की प्रेरणा दी गई है।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
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1
श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण-भवभय-दारुणं ।
नवकंज-लोचन, कंजमुख, करकंज, पदकंजारुणं ॥
हे मन, दयालु श्रीरामचंद्र का भजन कर जो संसार के भीषण भय को दूर करने वाले हैं; जिनके नेत्र नए कमल के समान हैं, मुख कमल जैसा है, तथा हाथ और लाल चरण भी कमल के समान हैं।
2
कंदर्प-अगणित-अमित-छबि, नवनील-नीरज-सुंदरं ।
पटपीत मानहु तड़ित-रुचि शुचि नौमि जनकसुता-वरं ॥
जिनका सौंदर्य अनगिनत कामदेवों से भी बढ़कर और नवीन नीले कमल के समान मनोहर है, तथा जिनके पीले वस्त्र बिजली के समान चमकीلے और पवित्र हैं, मैं जनकपुत्री (सीता) के वर श्री राम को नमन करता हूँ।
3
भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकंदनं ।
रघुनंद आनंदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं ॥
दीनों के बंधु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानवों और दैत्यों के वंश का नाश करने वाले, रघुकुल को आनंद देने वाले, परमानंद के मूल स्रोत, कोशल के चंद्रमा और महाराज दशरथ के पुत्र श्री राम का भजन करो।
4
सिर मुकुट, कुंडल तिलक चारु, उदार अंग विभूषणं ।
आजानुभुज, सरचाप-धर, संग्रामजित-खरदूषणं ॥
जिनके सिर पर मुकुट, कानों में सुंदर कुंडल, माथे पर तिलक और भव्य अंगों पर आभूषण सुशोभित हैं; जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं और जिन्होंने युद्ध में खर-दूषण को जीता है।
5
इति बदत तुलसीदास संकर-सेष-मुनि-मनरंजनं ।
मम हृदयकंज निवास करु कामादि-खल-दल-गंजनं ॥
तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि हे शिव, शेषनाग और मुनियों के मन को आनंद देने वाले तथा काम-क्रोध आदि दुष्ट विकारों का नाश करने वाले प्रभु, आप मेरे हृदय रूपी कमल में वास कीजिए।
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