ग़ज़ल
मन पछितैहै अवसर बीते
من پچھتائے ہے اوسر بیتے
यह पद मानव जीवन की नश्वरता और समय रहते प्रभु भक्ति के महत्व को रेखांकित करता है। इसमें सचेत किया गया है कि अवसर बीत जाने पर केवल पछतावा ही शेष रहता है, क्योंकि काल के चक्र से कोई बलशाली राजा भी नहीं बच सका और अंत में सभी को खाली हाथ ही जाना पड़ता है।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
गीत सुनें
1
मन पछितैहै अवसर बीते ।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु करम बचन अरु ही ते ॥
समय बीत जाने पर यह मन पछताएगा। इसलिए इस दुर्लभ मानव शरीर को पाकर कर्म, वचन और हृदय से भगवान के चरणों का भजन करो।
2
सहसबाहु दसंबदन आदि नृप बचे न काल बली ते ।
हम हम करि धन धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते ॥
सहस्रबाहु और रावण जैसे शक्तिशाली राजा भी बलवान काल (मृत्यु) से नहीं बच सके। मनुष्य अहंकार में 'मैं-मैं' करके धन और संपत्तियां जुटाता रहा, लेकिन अंत में सब खाली हाथ ही चले गए।
3
सुत बनितादि जानि स्वारथ-रत न करु नेह सबही तें ।
अंतहुँ तोहिं तजेंगे, पामर ! तू न तजै अबही तें ॥
पुत्र, स्त्री आदि को स्वार्थ में लीन जानकर इनसे मोह मत करो। हे मूर्ख! अंत में ये सब तुम्हें छोड़ ही देंगे, तो फिर तुम अभी से इन्हें क्यों नहीं त्याग देते?
4
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ त्यागु दुरासा जी तें ।
बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ विषय-भोग बहु घी तें ॥
हे मूर्ख मन! अब जाग जा, प्रभु से प्रेम कर और अपने हृदय से व्यर्थ की आशाओं को त्याग दे। तुलसीदास कहते हैं कि सांसारिक भोग-विलास रूपी घी डालने से वासना की आग कभी शांत नहीं हो सकती।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
