ग़ज़ल
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो
کیا کبھی یوں بھی جی پاؤں گا؟
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास प्रभु श्रीरघुनाथ की कृपा से संत-स्वभाव और विरक्तिपूर्ण जीवन जीने की अभिलाषा व्यक्त करते हैं। वे जो कुछ भी प्राप्त हो उसमें पूर्ण संतोष रखने और मन, वचन तथा कर्म से निरंतर परोपकार में लीन रहने का संकल्प करते हैं।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
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1
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो ।
श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपा ते संत सुभाव गहौंगो ॥
क्या मैं कभी इस प्रकार का पवित्र जीवन जी सकूँगा? क्या कृपालु श्री रघुनाथ जी की दया से मैं संतों जैसा स्वभाव अपना पाऊँगा?
2
यथालाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो ।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो ॥
जो कुछ भी प्राप्त हो उसमें सदा संतुष्ट रहूँगा और किसी से कुछ भी नहीं माँगूँगा। मन, वचन और कर्म से निरंतर दूसरों की भलाई में लगे रहने के इस नियम का सदा पालन करूँगा।
3
परुषबचन अतिदुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो ।
बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो ॥
कानों से अत्यंत असहनीय और कठोर वचन सुनकर भी मैं उस क्रोध की अग्नि में नहीं जलूँगा। अहंकार से मुक्त तथा शांत व समभाव मन रखकर, मैं दूसरों के केवल गुण ही कहूँगा और किसी का दोष नहीं निकालूँगा।
4
परिहरि देहजनित चिंता, दुख सुख समबुद्धि सहौंगो ।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरिभक्ति लहौंगो॥
शरीर से जुड़ी चिंताओं को त्यागकर मैं सुख और दुख को समान भाव से सहूँगा; तुलसीदास कहते हैं कि हे प्रभु, इसी मार्ग पर चलकर मैं आपकी अविचल भक्ति प्राप्त करूँगा।
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