“Hearing harsh, unbearable words with my ears, I shall not burn in that fire; free from pride, with an equanimous, serene mind, I shall praise others' virtues and speak of no faults.”
कानों से अत्यंत असहनीय और कठोर वचन सुनकर भी मैं उस क्रोध की अग्नि में नहीं जलूँगा। अहंकार से मुक्त तथा शांत व समभाव मन रखकर, मैं दूसरों के केवल गुण ही कहूँगा और किसी का दोष नहीं निकालूँगा।
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी मन की सच्ची शांति और संयम की बात करते हैं। वे कहते हैं कि जब कानों में किसी की अत्यंत कड़वी और असहनीय बातें पड़ेंगी, तब भी मैं क्रोध की आग में नहीं जलूंगा। मैं अपने अहंकार को पूरी तरह छोड़ दूंगा और अपने मन को हमेशा शीतल, शांत और समभाव में रखूंगा। दूसरों की कमियां निकालने के बजाय मैं केवल उनके अच्छे गुणों को ही देखूंगा और सराहूंगा। यह विचार हमें सिखाता है कि किसी के कड़वे बोल हमारा सुकून नहीं छीन सकते, अगर हम अपने भीतर धैर्य, विनम्रता और भलाई को अपनाए रखें।
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