ग़ज़ल

काँटे की भूल

کانٹے کی بھول
सुरेश दलाल· Ghazal· 5 shers

यह ग़ज़ल एक ऐसे विरोधाभासी प्रेम को दर्शाती है जहाँ प्रिय के नेत्रों के 'काँटे', भले ही हृदय को बेधते हों, फिर भी फूलों की तरह सहेजे जाते हैं। यह बताता है कि कैसे प्रिय की उपस्थिति रात के अंधेरे को भी उज्ज्वल कर देती है और सब कुछ मनमोहक व वांछनीय लगने लगता है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
નજરુંના કાંટાની ભૂલ મારા વ્હાલમા; વીંધે હૈયું ને તોય ફૂલ મારા વ્હાલમા!
मेरे प्रेम में तीखी नज़रों के काँटों की भूल है; वे दिल को छेदते हैं, फिर भी मेरे प्रेम में वे फूल ही हैं।
2
રાતનો અંધાર મને લાગે છે ઊજળો, તારો તે સંગઃ ઊને પ્હોર જાણે પીપળો;
रात का अंधेरा भी मुझे उज्ज्वल लगता है; तुम्हारा साथ दिन के तपते पहर में पीपल के पेड़ जैसा है।
3
વેણુના વ્હેણ માંહી ડૂલ મારા વ્હાલમાં; વીંધે હૈયું ને તોય ફૂલ મારા વ્હાલમા!
मेरे प्रेम में, बांसुरी की धुन में मेरा प्यार झूलता है। यह हृदय को बेधता है, फिर भी मेरे प्रेम में यह एक फूल है।
4
એકલીને આંહીં બધું લાગે અળખામણું, તારે તે રંગ, ભલા ટહુકે સોહામણું;
अकेले में यहाँ सब कुछ अप्रिय लगता है, पर तुम्हारी उपस्थिति में, प्रिय, चहचहाना भी सुहावना लगता है।
5
તું જે કહે તે કબૂલ મારા વ્હાલમાં; વીંધે હૈયું ને તોય ફૂલ મારા વ્હાલમા!
जो कुछ तुम कहते हो, मेरे प्यार में स्वीकार्य है। भले ही वह मेरे दिल को छेदे, मेरे प्यार में वह फूल जैसा लगता है।
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काँटे की भूल | Sukhan AI