“Senseless have grown our limbs without Keshav, like a body bereft of its head; yet hope still clings to the breath in this frame, yearning to live on for millions of years.”
श्रीकृष्ण के बिना सारी इंद्रियां उसी प्रकार शिथिल और निष्क्रिय हो गई हैं जैसे बिना सिर का शरीर। फिर भी उनके दर्शन की आशा में शरीर में सांसें टिकी हुई हैं और करोड़ों वर्ष जीवित रहने की आस बनी हुई है।
इस मार्मिक दोहे में गोपियां श्रीकृष्ण के वियोग का गहरा दुख व्यक्त कर रही हैं। वे कहती हैं कि अपने प्रिय केशव के बिना उनकी सभी इंद्रियां शिथिल और बेजान हो गई हैं, ठीक वैसे ही जैसे सिर के बिना कोई धड़ निष्प्राण हो जाता है। जीने की सारी सुधबुध खो चुकी है, फिर भी तन में सांसें केवल एक आस के सहारे चल रही हैं। उन्हें विश्वास है कि प्रभु एक दिन अवश्य लौटेंगे। कान्हा के आने की इसी आशा में वे करोड़ों वर्ष तक जीवित रह सकती हैं। यह दोहा सच्चे प्रेम और भक्ति की उस शक्ति को दर्शाता है, जहां मिलन की एक छोटी सी उम्मीद भी गहरे दर्द में जीवन का आधार बन जाती है।
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