“O Uddhava, we do not possess ten or twenty hearts; the one we had departed with Krishna, so who now is left to worship your Lord?”
हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। जो एक मन था, वह तो श्रीकृष्ण के साथ चला गया, अब तुम्हारे ईश्वर की आराधना कौन करे?
सूरदास जी के इस पद में गोपियां उद्धव से अपने मन की भोली दशा बयां करती हैं। जब उद्धव उन्हें निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश देते हैं, तो गोपियां बड़ी सहजता से कहती हैं, हे उद्धव, हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। हमारे पास तो बस एक ही हृदय था, और वह भी कान्हा के साथ चला गया। अब बिना मन के हम तुम्हारे निराकार ईश्वर की आराधना कैसे करें? यह पद अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। गोपियों के लिए भक्ति कोई कठिन साधना नहीं, बल्कि कान्हा के प्रति उनका अटूट भाव है, जो कभी उनसे अलग नहीं हो सकता।
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