ग़ज़ल
ऊधो मन न भए दसबीस
اودھو من نہ بھئے دس بیس
इस पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि उनके पास दस-बीस मन नहीं हैं, बल्कि एक ही हृदय था जो श्रीकृष्ण के साथ चला गया। कृष्ण के वियोग में उनकी इंद्रियाँ शिथिल हो चुकी हैं और वे केवल उनके लौटने की आशा में ही जीवित हैं। इस विरह-वेदना में वे किसी अन्य निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने में असमर्थ हैं।
Source: Sankshipt Sursagar (Indian Press, 1924) · HI
गीत सुनें
1
ऊधो मन न भए दसबीस ।
एक हुतो सो गयो स्याम सँग को अवराधे ईस ॥
हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं। जो एक मन था, वह तो श्रीकृष्ण के साथ चला गया, अब तुम्हारे ईश्वर की आराधना कौन करे?
2
इँद्री सिथिल भई केसो बिन ज्यों देही बिन सीस ।
आसा लगी रहत तनु श्वासा जीजो कोटि बरीस ॥
श्रीकृष्ण के बिना सारी इंद्रियां उसी प्रकार शिथिल और निष्क्रिय हो गई हैं जैसे बिना सिर का शरीर। फिर भी उनके दर्शन की आशा में शरीर में सांसें टिकी हुई हैं और करोड़ों वर्ष जीवित रहने की आस बनी हुई है।
3
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के सकल योग के ईस ।
सूरदास वा रस की महिमा जो पूँछै जगदीश ॥
आप सुंदर श्याम के मित्र हैं और समस्त योग के ज्ञाता हैं। सूरदास कहते हैं कि उस प्रेम-रस की महिमा कितनी अद्भुत है, जिसके बारे में स्वयं जगत के स्वामी श्रीकृष्ण भी पूछते हैं।
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