ग़ज़ल

जसोदा कबहिं बढ़ैगी चोटी

جسودا کبہں بڑھے گی چوٹی
सूरदास· Pad· 3 shers

इस पद में बालक कृष्ण अपनी माता यशोदा से बालसुलभ भाव से शिकायत करते हैं कि बार-बार दूध पीने के बाद भी उनकी चोटी बलराम की तरह लंबी और मोटी क्यों नहीं हो रही है। यह सूरदास के वात्सल्य भाव और कान्हा की मनमोहक बाल-लीला का अत्यंत सुंदर चित्रण है।

Source: Sankshipt Sursagar (Indian Press, 1924) · HI

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लिपि व अर्थ
1
जसोदा कबहिं बढ़ैगी चोटी । किती बार मोहिं दूध पिवत भई यह अजहूँ हैं छोटी ॥
हे माँ यशोदा, मेरी चोटी कब बढ़ेगी? मुझे दूध पीते हुए इतना समय हो गया, फिर भी यह आज भी छोटी ही है।
2
तू जो कहति बलकी बेनी ज्यों ह्वैहै लाँबी मोटी । काढ़त गुहत न्हवावत ओछत नागिनि सी भ्वै लोटी ॥
तुम तो कहती थीं कि मेरी चोटी बलराम भैया की चोटी की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी, और कंघी करते, गूंथते तथा नहलाते समय नागिन की तरह ज़मीन पर लोटने लगेगी।
3
काचो दूध पिवावत पचिपचि देत न माखन रोटी । सूर स्याम चिर जीवौ दोउ भैया हरि हलधरकी जोटी ॥
तुम मुझे बार-बार कच्चा दूध पिलाती हो और माखन-रोटी नहीं देतीं; सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और बलराम (हरि और हलधर) दोनों भाइयों की जोड़ी दीर्घायु हो।
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जसोदा कबहिं बढ़ैगी चोटी | Sukhan AI