ग़ज़ल

जसोदा हरि पालने झुलावै

جسودا ہری پالنے جھلاوے
सूरदास· Pad· 4 shers

यह पद माता यशोदा के वात्सल्य प्रेम का मनमोहक चित्रण करता है, जिसमें वे बाल कृष्ण को पालने में झुलाते हुए लोरी गाती हैं। वे बड़े दुलार से नींद का आह्वान करती हैं कि वह आकर उनके नन्हे कान्हा को सुला दे।

Source: Sankshipt Sursagar (Indian Press, 1924) · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
जसोदा हरि पालने झुलावै । हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै ॥
माता यशोदा बाल कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। वे उन्हें हिलाती-दुलारती और पुचकारती हैं तथा जो मन में आता है, वही गाकर सुलाने की कोशिश करती हैं।
2
मेरे लाल को आउ निदरिया काहे न आनि सुवावै । तू काहे न वेगीसी आवै तो को कान्ह बुलावै ॥
हे निंदिया! तू आकर मेरे लाल को क्यों नहीं सुलाती? तू जल्दी से क्यों नहीं आ जाती, तुझे तो स्वयं कान्हा बुला रहे हैं।
3
कबहूँ पलक हरि मूंदिलेत हैं कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै ह्वै रही कर करि सैन बतावै ॥
कभी श्री कृष्ण अपनी पलकें मूँद लेते हैं और कभी अपने होंठ फड़काते हैं। उन्हें सोता हुआ समझकर माता यशोदा चुप हो जाती हैं और हाथ के इशारे से दूसरों को भी शांत रहने को कहती हैं।
4
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरै गावै । जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ सो नँदभामिनी पावै ॥
इसी बीच श्रीकृष्ण व्याकुल होकर जाग उठे और यशोदा मधुर स्वर में गाने लगीं। सूरदास कहते हैं कि जो आनंद देवताओं और मुनियों के लिए भी दुर्लभ है, वह सुख नंद की पत्नी यशोदा प्राप्त कर रही हैं।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

जसोदा हरि पालने झुलावै | Sukhan AI